नई दिल्ली: स्थिति धीरे-धीरे शंख के करात जैसी होती जा रही है। एक तरफ दिन और रात—दोनों का औसत तापमान पूरे देश में बढ़ रहा है, दूसरी तरफ हिमालय के वन क्षेत्रों में हरियाली का आच्छादन कम हो रहा है। दोनों को मिलाकर जम्मू और कश्मीर से त्रिपुरा तक 13 राज्यों के भविष्य को लेकर मौसम वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की चिंता पहले से ही बढ़ रही थी। ऐसे में 'भारत राज्य वन रिपोर्ट 2023’ के अनुसार, चिंता और बढ़ गई है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने राज्यसभा में इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि भारतीय हिमालय क्षेत्र में वृक्ष आच्छादन 2021 में 15,427 वर्ग किमी था लेकिन 2023 में यह घटकर 15,075 वर्ग किमी रह गया यानी केवल दो वर्षों में हिमालय ने 352 वर्ग किमी वन आच्छादन खो दिया। प्रतिशत के हिसाब से 2021 से 2023 के बीच हिमालयी क्षेत्र ने 2 प्रतिशत से अधिक वन आच्छादन खोया है।
भारतीय हिमालय क्षेत्र 13 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में फैला है। इनमें जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा शामिल हैं। पिछले कुछ वर्षों से इन क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के बुनियादी ढांचे के विकास कार्य चल रहे हैं। खासकर पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों और उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश तथा लद्दाख में नई सड़कों, निर्माण और जलविद्युत परियोजनाओं पर काम जारी है। इनमें उत्तराखंड में ऋषिकेश बाईपास और गंगोत्री हाईवे जैसे प्रोजेक्ट भी शामिल हैं। गंगोत्री हाईवे के विस्तार के लिए लगभग 7000 पेड़ काटने की आवश्यकता होगी, जिससे विवाद शुरू हो गया है।
उत्तराखंड को प्राकृतिक कारणों से भूस्खलन-प्रवण क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में मिट्टी को मजबूत बनाए रखने के लिए अधिक पेड़ों का होना जरूरी है। इसके बावजूद गंगोत्री हाईवे को चौड़ा करने के लिए इतने पेड़ काटने पर सवाल उठ रहे हैं। हाल के वर्षों में जोशीमठ धंसने और उत्तरकाशी में भूस्खलन जैसी घटनाओं ने स्थानीय लोगों का जोखिम बढ़ा दिया है।
इसके साथ ही औसत तापमान में वृद्धि और अत्यधिक वर्षा भी चिंता का विषय है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अनुसार 1901 से 2018 के बीच भारत का औसत तापमान लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। 1986 से 2015 के बीच सबसे गर्म दिन का तापमान 1966-1986 की तुलना में लगभग 0.63 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा, जबकि सबसे ठंडी रात का तापमान लगभग 0.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ा। दूसरी ओर, 24 घंटे में 150 मिमी से अधिक वर्षा की घटनाएं 1950 से 2015 के बीच लगभग 75 प्रतिशत बढ़ गई हैं।
ऐसे में विकास के नाम पर हिमालय में हो रही वनों की कटाई चिंता बढ़ा रही है। वर्षा के पैटर्न, मिट्टी की मजबूती और पर्यावरण संरक्षण—इन सभी में पेड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अगर पेड़ ही नहीं रहेंगे तो भविष्य के परिणाम चिंताजनक होना तय है।