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1 जून से शुरू होगा ‘खेत बचाओ अभियान’, किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग का संदेश देंगे शिवराज सिंह चौहान

रायसेन के रामसिया गांव से होगा अभियान का राष्ट्रीय शुभारंभ, एक महीने तक देशभर में किसानों से ।

By शिखा सिंह

May 31, 2026 18:25 IST

नई दिल्ली : केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान 1 जून से देशव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ की शुरुआत करेंगे। यह अभियान प्रधानमंत्री के उस आह्वान के अनुरूप शुरू किया जा रहा है, जिसमें किसानों से उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को कम करने और संतुलित खेती की ओर बढ़ने की अपील की गई थी।

यह अभियान 1 जून से 30 जून तक पूरे देश में चलाया जाएगा। अभियान का शुभारंभ मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के रामसिया गांव से किया जाएगा। इसके माध्यम से किसानों को मिट्टी के स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग तथा नैनो यूरिया और जैविक विकल्पों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

अभियान को सफल बनाने के लिए शिवराज सिंह चौहान स्वयं राज्यों के मुख्यमंत्रियों से टेलीफोन पर संपर्क कर रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर इस अभियान में सहयोग की अपील की है।

अभियान के तहत केंद्रीय मंत्री एक महीने तक देशभर का दौरा करेंगे। इस दौरान वे खेतों में जाकर किसानों से सीधे संवाद करेंगे और उन्हें संतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने तथा वैकल्पिक कृषि संसाधनों के महत्व के बारे में जानकारी देंगे। यह पहल ऐसे समय में शुरू की जा रही है जब केंद्र सरकार पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईंधन, उर्वरक और अन्य आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता पर लगातार नजर बनाए हुए है।

बुधवार को पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर गठित मंत्रियों के अनौपचारिक समूह की छठी बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की। बैठक में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि देशभर में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सामान्य बनी हुई है और नागरिकों को पेट्रोल, डीजल तथा रसोई गैस की घबराहट में खरीदारी करने की आवश्यकता नहीं है।

बैठक में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा, हरदीप सिंह पुरी, प्रह्लाद जोशी और अश्विनी वैष्णव भी शामिल हुए।बैठक के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि देश में आपूर्ति की स्थिति पूरी तरह सामान्य है और सरकार आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है।

सरकार के अनुसार देश में पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता पर्याप्त मात्रा में है। भारत की कुल रिफाइनिंग क्षमता 258.1 मिलियन टन प्रतिवर्ष है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में घरेलू खपत 243.2 मिलियन टन रही थी। इसके अतिरिक्त भारत हर वर्ष लगभग 61.5 मिलियन टन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी करता है, जिससे घरेलू आपूर्ति पर कोई दबाव नहीं है। सरकारी तेल विपणन कंपनियां वैश्विक कीमतों में वृद्धि का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर न पड़े, इसके लिए प्रतिदिन लगभग 550 करोड़ रुपये तक का नुकसान वहन कर रही हैं।

खरीफ 2026 सीजन के लिए देश में उर्वरकों की कुल आवश्यकता 390.54 लाख मीट्रिक टन आंकी गई है। वर्तमान में 200.47 लाख मीट्रिक टन उर्वरक उपलब्ध हैं, जो कुल आवश्यकता का 51 प्रतिशत से अधिक है।

पश्चिम एशिया संकट के बाद आयात और घरेलू उत्पादन के माध्यम से लगभग 122.4 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त उर्वरक उपलब्ध कराए गए हैं। इसके अलावा मई और जून के दौरान बंदरगाहों पर लगभग 15 लाख मीट्रिक टन डीएपी और 10 लाख मीट्रिक टन एनपीके उर्वरक पहुंचने की उम्मीद है।

भारत अपनी यूरिया आवश्यकता का लगभग 70 प्रतिशत और पोटाश की पूरी जरूरत आयात के माध्यम से पूरी करता है। इसके प्रमुख स्रोत सऊदी अरब, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन और ईरान हैं।

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र के समुद्री मार्गों में व्यवधान तथा कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। इसके कारण माल ढुलाई की लागत और उर्वरक उत्पादन की लागत दोनों में वृद्धि हुई है। प्राकृतिक गैस यूरिया उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव यूरिया आयात लागत और सरकारी सब्सिडी पर पड़ता है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे तैयारियों को और मजबूत करें तथा यह सुनिश्चित करें कि किसानों को उर्वरक और अन्य आवश्यक कृषि संसाधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते रहें। उनका कहना है कि इससे खाद्य पदार्थों की कीमतों को स्थिर बनाए रखने में मदद मिलेगी।सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि उर्वरक सब्सिडी का भुगतान नियमित रूप से साप्ताहिक आधार पर किया जा रहा है और आवश्यक कृषि संसाधनों के भंडार की लगातार समीक्षा की जा रही है।

इसी परिप्रेक्ष्य में ‘खेत बचाओ अभियान’ को खेत स्तर पर एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है। इसका उद्देश्य यूरिया के अनावश्यक उपयोग को कम करना, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार लाना और उर्वरकों के आयात पर निर्भरता को घटाना है, ताकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी प्रकार की अनिश्चितता के बावजूद कृषि क्षेत्र मजबूत बना रहे।


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