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राजमिस्त्री की बेटी रितु मंडल ने रचा इतिहास, विश्व योगासन चैंपियनशिप में जीते दो स्वर्ण पदक

अहमदाबाद में पहले विश्व योगासन चैंपियनशिप में किया कमाल, हुगली के छोटे गांव से निकलकर विश्व मंच पर चमकी भारतीय खिलाड़ी।

By शिखा सिंह

Jun 07, 2026 19:34 IST

अहमदाबाद : पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के एक छोटे से गांव की रहने वाली और एक राजमिस्त्री की बेटी 20 वर्षीय रितु मंडल ने अहमदाबाद में आयोजित पहले विश्व योगासन चैंपियनशिप में दो स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इस उपलब्धि ने उन्हें और उनके परिवार को उस सपने के और करीब पहुंचा दिया है, जिसमें वह भारत का प्रतिनिधित्व दुनिया के सबसे बड़े खेल मंचों पर करना चाहती हैं और एक दिन ओलंपिक पदक जीतने का लक्ष्य रखती हैं।

रितु के लिए ये दोनों स्वर्ण पदक वर्षों की मेहनत, त्याग और अटूट संकल्प का परिणाम हैं। उनकी जीत को देखने के लिए उनके माता-पिता और बड़े भाई अहमदाबाद पहुंचे थे। जब उन्होंने रितु को कंधों पर तिरंगा लपेटे जीत का जश्न मनाते देखा, तो उनकी आंखें भावुकता से भर उठीं।

रितु ने कहा, “मेरे पिता एक राजमिस्त्री हैं। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद मेरे परिवार ने हमेशा मेरे सपनों का समर्थन किया। जब मेरी उम्र के कई लोग अन्य गतिविधियों में व्यस्त थे, तब मैंने वर्षों तक योगासन का अभ्यास और प्रशिक्षण जारी रखा। रास्ते में कई चुनौतियां आईं, लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी क्योंकि मुझे अपने लक्ष्य पर विश्वास था।”

रितु की सफलता की कहानी में उनके बड़े भाई गौतम की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही है। गौतम स्वयं एक योगासन खिलाड़ी रहे हैं और राज्य स्तर तक प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं। हालांकि आर्थिक कठिनाइयों के कारण उन्हें खेल छोड़ना पड़ा। हाल ही में फिजियोथेरेपी का कोर्स पूरा करने वाले गौतम अब अपना अधिकांश समय रितु के प्रशिक्षण और मार्गदर्शन में लगाते हैं। वह अपनी बहन के माध्यम से उस सपने को साकार होते देखना चाहते हैं, जिसे वह स्वयं परिस्थितियों के कारण पूरा नहीं कर पाए।

रितु बताती हैं कि उनके भाई का योगासन के प्रति जुनून आज भी पहले जैसा ही है। मेरे भाई योगासन को लेकर बेहद समर्पित हैं और चाहते हैं कि मैं इस खेल में सबसे ऊंचे मुकाम तक पहुंचूं। शायद इसलिए भी कि वह खुद एक योगासन खिलाड़ी रहे हैं, लेकिन परिस्थितियों के कारण आगे नहीं बढ़ सके। उन्हें मुझमें क्षमता दिखाई देती है और वह लगातार मुझे बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करते रहते हैं।

रितु ने मुस्कुराते हुए बताया कि उनके भाई ने कभी भी उन्हें यह नहीं कहा कि वह सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी हैं या उनमें कोई कमी नहीं है। अच्छे प्रदर्शन के बाद भी वह मुझसे कहते हैं, बहुत अच्छा, लेकिन अभी और सुधार की गुंजाइश है। आगे बढ़ते रहो, तुम्हें अभी लंबा सफर तय करना है। मुझे उनके व्यक्तित्व की यही बात सबसे ज्यादा पसंद है। वह मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ चाहते हैं और कभी मुझे आत्मसंतुष्ट नहीं होने देते। उनका सपना है कि मैं भारत का प्रतिनिधित्व करूं और सर्वोच्च स्तर पर पदक जीतूं।

विश्व मंच पर अपनी पहचान बनाने से पहले रितु राष्ट्रीय स्तर पर भी शानदार प्रदर्शन कर चुकी थीं। उन्होंने चेन्नई में आयोजित खेलो इंडिया यूथ गेम्स और असम में आयोजित खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स दोनों में कांस्य पदक जीते थे। इन सफलताओं ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का आत्मविश्वास दिया।

अहमदाबाद में उन्होंने यह दिखा दिया कि वह कितनी लंबी दूरी तय कर चुकी हैं। दुनिया भर के शीर्ष योगासन खिलाड़ियों के खिलाफ उन्होंने संतुलन, लचीलापन, ताकत और सटीकता का अद्भुत प्रदर्शन किया। उनके इस शानदार प्रदर्शन ने उन्हें दो स्वर्ण पदक दिलाए और वह विश्व योगासन चैंपियनशिप में दो स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गईं।

अहमदाबाद में मिली यह सफलता इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह विश्व योगासन चैंपियनशिप का पहला संस्करण था। योगासन को वैश्विक स्तर पर लगातार पहचान मिल रही है और रितु जैसी खिलाड़ी भारत को इस खेल में अग्रणी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

हालांकि इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करने के बाद भी रितु का मानना है कि उनकी यात्रा अभी शुरू हुई है। उन्होंने कहा कि मैं अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहती हूं। मेरा सपना है कि योगासन एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और अंततः ओलंपिक का हिस्सा बने। भारत के लिए ओलंपिक पदक जीतना मेरा सबसे बड़ा लक्ष्य है।

रितु ने अपनी सफलता में गलगोटियास यूनिवर्सिटी के योगदान को भी महत्वपूर्ण बताया। विश्वविद्यालय उन्हें हर महीने 13 हजार रुपये की छात्रवृत्ति प्रदान करता है, जिससे उनके प्रशिक्षण और अन्य खर्चों में मदद मिलती है। खिलाड़ियों के लिए आर्थिक सहायता बहुत महत्वपूर्ण होती है। यह छात्रवृत्ति मुझे अपने खेल को जारी रखने में मदद करती है और मेरे परिवार पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ने देती। इससे मुझे अपने भविष्य पर ध्यान केंद्रित करने का आत्मविश्वास मिलता है।

रितु ने अपने माता-पिता के प्रति भी गहरा आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “मेरे माता-पिता ने हर कदम पर मेरा पूरा साथ दिया है। आज मैंने जो कुछ भी हासिल किया है, वह उनके त्याग और मुझ पर किए गए विश्वास की वजह से संभव हो पाया है।”

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