ढाकाः बांग्लादेश का भारत में होने वाले T20 वर्ल्ड कप से दूरी बनाने का फैसला सिर्फ एक टूर्नामेंट से हटने का मामला नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक सोच का नतीजा है, जिसमें क्रिकेट से ज्यादा हावी होते दिखे अफसरशाही और राजनीतिक दबाव। लंबे समय से चल रही बैठकों, कूटनीतिक प्रयासों और ICC के साफ अल्टीमेटम के बावजूद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने भारत आने से इनकार कर दिया, जिससे अब उसका वर्ल्ड कप में खेलना लगभग असंभव माना जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह फैसला आखिर किसके हित में लिया गया। शेड्यूल, वेन्यू और टीम संयोजन पूरी तरह तय हो जाने के बाद सुरक्षा का मुद्दा उठाना बोर्ड की तैयारी और दूरदृष्टि दोनों पर सवाल खड़े करता है। अगर सुरक्षा ही मुख्य चिंता थी, तो यह मुद्दा उस वक्त क्यों नहीं उठाया गया जब ICC भारत को मेजबान घोषित कर रहा था। अंतिम समय में ऐसा रुख अपनाने से न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंच पर बांग्लादेश की विश्वसनीयता प्रभावित हुई, बल्कि खिलाड़ियों के करियर पर भी सीधा असर पड़ता दिख रहा है।
21 जनवरी को हुई ICC की अहम बैठक इस पूरे विवाद की दिशा तय करने वाली साबित हुई। भारत में खेलने से इनकार के प्रस्ताव को सिर्फ दो देशों का समर्थन मिला-बांग्लादेश और पाकिस्तान। बाकी 14 सदस्य देशों ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। यह आंकड़ा साफ करता है कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट समुदाय ने बांग्लादेश के तर्कों को न तो व्यावहारिक माना और न ही पर्याप्त रूप से ठोस। इसके बाद ICC ने गेंद बांग्लादेश के पाले में डालते हुए उसे सरकार से बात कर अंतिम फैसला बताने का समय दिया।
अगले ही दिन ढाका में हुई बैठक ने यह साफ कर दिया कि इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय क्रिकेट बोर्ड का नहीं, बल्कि सरकार का है। स्पोर्ट्स एडवाइजर आसिफ नजरुल का बयान इस बात की पुष्टि करता है कि सुरक्षा को लेकर लिया गया फैसला अपरिवर्तनीय है। इसके बाद BCB अध्यक्ष अमीनुल इस्लाम का यह कहना कि टीम श्रीलंका में वर्ल्ड कप मैच खेलना चाहती है, दरअसल एक ऐसे विकल्प की मांग थी जिसे ICC पहले ही अव्यावहारिक बता चुका था।
ICC का रुख इस पूरे मामले में अपेक्षाकृत स्पष्ट और तर्कसंगत रहा। भारत में लगातार अंतरराष्ट्रीय सीरीज हो रही हैं, कई विदेशी टीमें और खिलाड़ी बिना किसी समस्या के खेल रहे हैं और किसी भी आधिकारिक सुरक्षा एजेंसी ने जोखिम की पुष्टि नहीं की है। ऐसे में सिर्फ बांग्लादेश के लिए विशेष व्यवस्था करना न केवल टूर्नामेंट की संरचना को नुकसान पहुंचाता, बल्कि एक खतरनाक मिसाल भी कायम करता।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस फैसले का खामियाजा खिलाड़ी भुगतेंगे। वर्ल्ड कप जैसे मंच से बाहर होना सिर्फ प्रतिष्ठा का नुकसान नहीं, बल्कि अनुभव, एक्सपोजर और करियर ग्रोथ पर सीधा प्रहार है। अगर बांग्लादेश वर्ल्ड कप से बाहर होता है और उसकी जगह स्कॉटलैंड को मौका मिलता है, तो यह संकेत होगा कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भावनाओं या राजनीतिक जिद से ज़्यादा अहमियत नियमों और प्रतिबद्धताओं की है।
अंततः यह पूरा प्रकरण इस सवाल पर आकर टिक जाता है कि क्या बांग्लादेश क्रिकेट ने दूरगामी सोच के बजाय तात्कालिक राजनीतिक संतुलन को प्राथमिकता दी। ICC अब अंतिम फैसला सुनाने की स्थिति में है, लेकिन इस विवाद ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि इस टकराव में सबसे बड़ा नुकसान खुद बांग्लादेश क्रिकेट को ही उठाना पड़ सकता है।