कोलकाताः पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के मतों की गिनती कल कड़ी सुरक्षा के बीच 77 मतगणना केन्द्रों पर की जाएगी। चुनाव अधिकारियों ने कहा है कि मतगणना केन्द्रों पर सभी तैयारी पूरी हो गई है और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बहु-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की गई है। पहले, डाक से प्राप्त मतपत्रों की गिनती की जाएगी।
इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक्स वोटिंग मशीनों के मतों की गिनती होगी। उम्मीदवार, एजेंट और पर्यवेक्षक पूरी मतगणना के दौरान उपस्थित रहेंगे। शुरुआती रुझान सुबह से मिलने शुरू हो जाएंगे और दोपहर तक परिणाम स्पष्ट होने की संभावना है।
क्योंकि ध्यान रहे कि पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां अलग-अलग आंकड़ों के मुताबिक 25 से 30 प्रतिशत तक मुस्लिम मतदाता हैं। तो बाकी दूसरी तरफ़ का पोलराइजेशन (ध्रुवीकरण) काफ़ी मजबूत होना चाहिए। क्योंकि बीजेपी को मुस्लिम वोट तो बहुत कम या नहीं के बराबर ही मिले होंगे।
एक और अहम बात है बीजेपी के नज़रिए से और विपक्ष के नज़रिए से भी, राजनीतिक हलकों में पश्चिम बंगाल को एक लास्ट फ्रंटियर की तरह से देखा जा रहा है क्योंकि उत्तर में, केंद्रीय भारत में, पूर्वी भारत में ज़्यादातर जगह बीजेपी अपनी जीत का झंडा, परचम फहरा चुकी है।
बंगाल अभी तक उससे बचा हुआ है। बीजेपी अब तक यहां जीतने में कामयाब नहीं हुई है। इसलिए यह चुनाव बीजेपी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और विपक्ष के लिए इसलिए कि अगर बीजेपी को रोकना है, बीजेपी के बढ़ते हुए प्रभाव को, उसके एकछत्र राज को रोकना है, तो पश्चिम बंगाल में टीएमसी को बने रहना होगा। यह उसके लिए तो बहुत महत्वपूर्ण है ही, समूचे विपक्ष के लिए भी अहम है।
दोनों तरफ़ से मुक़ाबला इसलिए बहुत अहम हो जाता है
ऐसे चुनाव में एक अहम मुद्दा एसआईआर का भी रहा है, वोटर लिस्ट में जो स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न हुआ है, वह राज्य के चुनाव में एक ऐसा विषय बना हुआ है, जिसकी वजह से लोगों का पारा भी काफ़ी चढ़ा हुआ है, तनाव भी है और यह एक संवेदनशील मुद्दा भी है।
बड़ी संख्या में लोगों के वोट कटे हैं और उस बड़ी संख्या में जो वोट कटे हैं उसमें भी बड़ी संख्या अल्पसंख्यक यानी मुस्लिम मतदाताओं की है। लेकिन यह वोट सेंट्रल बंगाल, मुर्शिदाबाद, मालदा और इनके आस-पास के इलाकों में कटे हैं।
SIR का असर
पश्चिम बंगाल में स्पष्ट दिख रहा है कि उसमें कई जगह गड़बड़ हुई है, ग़लतियां हुई हैं।
किसी घर में पिता का वोट तो रह गया है, बाकी सदस्यों का नहीं है। कहीं पति का रह गया है, पत्नी और बच्चों का कट गया है। कहीं पत्नी का रह गया है बाकी घर वाले नहीं हैं।
फिर एक मुद्दा ध्रुवीकरण का है, जो पश्चिम बंगाल की राजनीति का, वहां की जो सियासी ज़मीन है, उसकी एक सच्चाई है.
अब ध्रुवीकरण शहरी इलाकों में काफ़ी है, ख़ासकर उन लोगों में जो मूलतः बंगाली नहीं हैं, चाहे वे मारवाड़ी हैं, चाहे हिन्दी भाषी लोग हैं, जो लंबे समय से बंगाल में रह रहे हैं। लेकिन वे काफ़ी कुछ बीजेपी का साथ देते हुए दिख रहे हैं और शहरों में हिंदू-मुस्लिम की चर्चा ज़्यादा दिखेगी, ग्रामीण इलाकों में उसकी बात कम दिखेगी। लेकिन अच्छी बात यह है कि बात कितनी भी हो, मुद्दा जितना भी अहम हो, चुनावी असर जो भी दिखा हो, लेकिन अपेक्षाकृत और अमूमन हमें पूरे बंगाल में सात दिन घूमने के दौरान कोई कम्युनल टेंशन या सांप्रदायिक तनाव की झलक दिखी नहीं।
कई जगह लोग काफ़ी अमन-चैन से रह रहे थे। मुस्लिम इलाके अलग हैं, हिंदू इलाके अलग हैं।
यह तो अब पूरे देश की कहानी है और यह पश्चिम बंगाल की कहानी भी है। गांव में भी ऐसा ही है, एक-दूसरे से जुड़े हुए घर आपको बहुत कम जगहों पर मिलेंगे।