पणजीः गोवा के पणजी में आयोजित कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन (सीपीए) इंडिया रीजन जोन VII सम्मेलन के समापन सत्र में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को और मजबूत बनाने के लिए नीति और कानून निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना अब समय की जरूरत है। इस बीच केंद्र सरकार ने भी महिला आरक्षण को लेकर बड़ा कदम उठाते हुए 2029 से लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में प्रक्रिया तेज कर दी है, जिससे देश की सियासत में बड़े बदलाव की आहट साफ दिखने लगी है।
बिरला ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र तभी सशक्त और जीवंत बन सकता है, जब उसमें समाज के सभी वर्गों की समान भागीदारी हो। उन्होंने पंचायतों, राज्य विधानसभाओं और संसद तक महिलाओं की भूमिका को बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा कि इससे न केवल प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, बल्कि निर्णय प्रक्रिया भी अधिक संतुलित और प्रभावी बनेगी। उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से शासन में संवेदनशीलता, पारदर्शिता और जवाबदेही को नई मजबूती मिलेगी, जो एक विकसित राष्ट्र की बुनियादी आवश्यकता है।
सरकार की पहल-महिला आरक्षण लागू करने की दिशा में तेज कदम
महिला आरक्षण के मुद्दे पर केंद्र सरकार ने स्पष्ट रूप से सक्रिय रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “समय की मांग” करार देते हुए कहा कि इसे लागू करने में किसी भी प्रकार की देरी देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगी।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023) में संशोधन के मसौदे को मंजूरी दे दी है। इस संशोधन के जरिए 2029 के लोकसभा चुनाव से महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की योजना बनाई गई है।
इस महत्वपूर्ण विधायी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए संसद का विशेष सत्र 16 से 18 अप्रैल तक बुलाया गया है। इस सत्र में संशोधन विधेयक पेश किया जाएगा, जिसे भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
बदलेगा संसद का स्वरूप-सीटें बढ़ेंगी, भागीदारी भी
प्रस्तावित संशोधन के तहत लोकसभा की कुल सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रावधान किया गया है। इनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, जो कुल सीटों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है।
यह बदलाव संसद की संरचना को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे न केवल महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, बल्कि वे नीति निर्माण और कानून बनाने की प्रक्रिया में भी प्रभावी भूमिका निभा सकेंगी। वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो 18वीं लोकसभा में केवल 74 महिला सांसद हैं, जो कुल का लगभग 13.6 प्रतिशत है। राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की औसत भागीदारी 9 से 10 प्रतिशत के बीच है।
देशभर में कुल 4,666 सांसदों और विधायकों में सिर्फ 464 महिलाएं हैं, यानी लगभग 10 प्रतिशत। यह आंकड़ा वैश्विक औसत (करीब 27 प्रतिशत) से काफी कम है, जो इस सुधार की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।
पंचायत से संसद तक-महिला नेतृत्व का विस्तार और भविष्य का विजन
भारत में पंचायत स्तर पर 33 प्रतिशत आरक्षण ने महिलाओं के सशक्तिकरण की मजबूत नींव रखी है। लाखों महिलाएं आज स्थानीय शासन में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं और कई जगहों पर प्रभावी नेतृत्व भी कर रही हैं। इसी सफलता को आधार बनाकर अब इसे राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। इससे राजनीतिक भागीदारी का दायरा व्यापक होगा और निर्णय प्रक्रिया में विविधता आएगी।
ओम बिरला ने अपने संबोधन में युवाओं की भूमिका को भी अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए युवा और महिलाओं की संयुक्त भागीदारी जरूरी है। उन्होंने छात्रों और युवा विधायकों से आह्वान किया कि वे राजनीति को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाएं और अपने-अपने क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव लाने में योगदान दें।
महिला आरक्षण का यह प्रस्ताव केवल एक विधायी सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बदलाव की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है। इससे भारतीय लोकतंत्र अधिक समावेशी, संतुलित और उत्तरदायी बन सकेगा।