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लोथल में सिंधु सभ्यता की यूनिकॉर्न मुहर की खोज बंगाली पुरातत्वविद ने की

अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं पुरातत्वविद शुभ मजुमदार

By कुबलय बंद्योपाध्याय, Posted by डॉ.अभिज्ञात

Jan 06, 2026 10:51 IST

गांधीनगर (गुजरात): सावधानी से ब्रश से मिट्टी हटाते ही पकी हुई मिट्टी की एक पट्टिका बाहर आ गई। पट्टिका के ठीक बीच में एक सींग वाले जानवर की नक्काशी थी। पहचानने में कोई कठिनाई नहीं हुई-वह यूनिकॉर्न था। इसके बाद ऐसी ही दो और पट्टिकाएँ मिलीं। उनमें जानवर का चित्र नहीं था, बल्कि कुछ रहस्यमय अक्षर खुदे हुए थे। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के पुरातात्विक स्थलों से इस प्रकार की एक हजार से अधिक मुहरें मिली हैं। लगभग दो सेंटीमीटर लंबी और उतनी ही चौड़ी इन मुहरों का ताज़ा उदाहरण किसी सिंधु नदी तटवर्ती स्थान से नहीं बल्कि गुजरात के लोथल पुरास्थल से मिला है। बंगाली पुरातत्वविद शुभ मजुमदार के नेतृत्व में नवंबर में इस क्षेत्र में शुरू हुए सर्वेक्षण के दौरान यूनिकॉर्न मुहर सहित कई अत्यंत प्राचीन पुरावशेष मिले हैं।

परित्यक्त होने के बावजूद आज भी संभावनाओं से भरपूर पहली खोज के 70 वर्ष बाद लोथल ने एक बार फिर यह साबित किया है। सिंधु नदी के दोनों किनारों पर कम से कम चार से साढ़े चार हजार वर्ष पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले हैं और ऐसे पुरातात्विक स्थलों की संख्या लगभग डेढ़ हजार है। स्कूल की इतिहास पुस्तकों के कारण हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के नाम तो अधिकांश लोग जानते हैं लेकिन इन दो शहरों के अलावा हरियाणा के हिसार स्थित राखीगढ़ी और गुजरात के लोथल से भी अत्यंत महत्वपूर्ण अवशेष मिले हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अनुसार 1955 में पुरातत्वविद शिकारीपुरा रंगनाथ राव के नेतृत्व में पहली बार लोथल पुरास्थल की खोज हुई थी। तब से यहाँ से 213 मुहरें मिल चुकी हैं। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के अलावा सिंधु सभ्यता के किसी अन्य स्थल से इतनी अधिक मुहरें नहीं मिली हैं।

2025 की शुरुआत में मार्च से मई तक और फिर नवंबर में एएसआई ने लोथल में नए सिरे से खुदाई शुरू की। इस बार अभियान का नेतृत्व बंगाली पुरातत्वविद शुभ मजुमदार कर रहे हैं। पिछले वर्ष उनके नेतृत्व में संरक्षण कार्य के बाद शिवाजी के 12 किलों को यूनेस्को का ‘वर्ल्ड हेरिटेज’ दर्जा मिला था। ‘मराठा मिलिटरी लैंडस्केप’ पर काम करने के बाद अब वे गुजरात के लोथल में नई खुदाई की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और काम शुरू होते ही सफलता मिली।

अपने हालिया कार्य और उसके परिणामों के बारे में शुभ मजुमदार ने ‘ई समय’ से कहा, “लोथल में हम तीन क्षेत्रों में सर्वेक्षण कर रहे हैं। ‘प्लेस-ए’ में पुरास्थल का मुख्य महल क्षेत्र (ऊपरी नगर) और आवासीय क्षेत्र (निचला नगर) शामिल है। ‘प्लेस-बी’ समुद्र के निकट का इलाका है और ‘प्लेस-सी’ पुरास्थल का प्रवेश क्षेत्र।” इन तीनों में से ‘प्लेस-ए’ से तीन मुहरें मिली हैं। शुभ मजुमदार के अनुसार, “इन तीन मुहरों में जिस पर यूनिकॉर्न का चित्र है, वह स्टिएटाइट (सोपस्टोन जैसी नरम पत्थर) से बनी है। बाकी दो मुहरों पर कोई चित्र नहीं है-उन पर केवल सिंधु सभ्यता की अन्य मुहरों जैसे कुछ अक्षर खुदे हैं। ये दोनों मुहरें पकी हुई मिट्टी की हैं।”

सिर्फ मुहरें ही नहीं, मात्र दो महीने की खुदाई में कुछ भट्टियाँ भी मिली हैं। उनके पास से कार्नेलियन पत्थर के कुछ मनके भी मिले, जिससे अनुमान लगाया जा रहा है कि यह क्षेत्र मनके बनाने की कार्यशाला रहा होगा। सिंधु सभ्यता में इस प्रकार के मनकों के अनेक उदाहरण मिले हैं। इसके अलावा सोने के मनके भी मिले हैं-यह खोज विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इस क्षेत्र में सोने के अवशेष बहुत कम पाए गए हैं। साथ ही पकी मिट्टी से बने पहियों वाले खिलौना वाहन और गुड़ियाएँ भी मिली हैं।

लगभग 1920 के आसपास आज के पाकिस्तान के सिंध प्रांत में एक टीले पर बंगाली पुरातत्वविद राखालदास बंद्योपाध्याय ने खुदाई शुरू की थी। तब माना गया था कि वह टीला किसी प्राचीन बौद्ध विहार के अवशेष हैं, लेकिन वास्तव में वहीं मोहनजोदड़ो स्थित था। लगभग साढ़े चार हजार वर्ष पुराने उस शहर की खोज ने भारत की सभ्यता के इतिहास को एक झटके में कम से कम दो हजार वर्ष और प्राचीन कर दिया था। उस खोज के सौ से अधिक वर्ष बाद, क्या एक बार फिर बंगाली पुरातत्वविद शुभ मजुमदार के हाथों सिंधु पुरास्थलों के इतिहास में नया मोड़ आने वाला है?

इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के लिए वर्ष 2026 अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है।

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