नयी दिल्लीः लगभग एक दशक पहले की यादें फिर ताज़ा हो गईं। 2016 के ‘देशद्रोही नारे’ विवाद के बाद 2026 की शुरुआत में एक बार फिर नारा-विवाद को लेकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में माहौल गरमा गया है। इस बार आरोप है कि परिसर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ख़िलाफ़ ‘आपत्तिजनक’ नारे लगाए गए। इस घटना पर मंगलवार को विश्वविद्यालय प्रशासन ने अभूतपूर्व सख़्त रुख़ अपनाया।
मंगलवार को जारी एक बयान में जेएनयू प्रशासन ने साफ़ कहा कि विश्वविद्यालय परिसर को किसी भी हाल में ‘नफ़रत की प्रयोगशाला’ नहीं बनने दिया जाएगा। आरोपित छात्रों के ख़िलाफ़ कठोरतम अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी देने के साथ-साथ इस मामले में स्थानीय थाने में एक FIR भी दर्ज कराई गई है।
घटना की शुरुआत सोमवार रात से हुई। 5 जनवरी 2020 को परिसर में हुई हिंसा की छठी बरसी के अवसर पर साबरमती हॉस्टल के बाहर जेएनयू छात्रसंघ ने एक सभा आयोजित की थी। उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने जेएनयू के पूर्व छात्र नेताओं उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिका खारिज कर दी। इसके चलते वह सभा अंततः एक राजनीतिक विरोध-सभा में बदल गई। आरोप है कि उसी विरोध-सभा में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के ख़िलाफ़ ‘आपत्ति’ नारे लगाए गए।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई उस सभा के कुछ वीडियो में ऐसे नारों की आवाज़ सुनी जा सकती है। हालांकि ‘समाचार एई समय’ ने इन वीडियो की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं की है। फिर भी इन्हीं वीडियो के आधार पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने कार्रवाई की है।
प्रशासन का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है लेकिन उसकी आड़ में नफ़रत फैलाने का अधिकार किसी को नहीं है। इस घटना को वे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना और विश्वविद्यालय की आचार-संहिता का उल्लंघन मान रहे हैं। दोषी पाए गए छात्रों को निलंबित किया जा सकता है, यहां तक कि विश्वविद्यालय से स्थायी रूप से निष्कासित करने जैसी कठोर सज़ा भी दी जा सकती है।
विश्वविद्यालय प्रशासन की शिकायत के आधार पर वसंत कुंज थाने में भारतीय न्याय संहिता की कई धाराओं के तहत छात्रों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है। FIR में JNUSU की वर्तमान अध्यक्ष अदिति मिश्रा का नाम भी शामिल है। अदिति का दावा है कि नारे वैचारिक आधार पर लगाए गए थे और किसी विशेष व्यक्ति पर हमला करने का उद्देश्य नहीं था।
इधर नारा-विवाद को लेकर गिरिराज सिंह जैसे BJP नेताओं ने प्रदर्शनकारी छात्रों को ‘देश-विरोधी’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और ‘अर्बन नक्सल’ कहकर निशाना बनाना शुरू कर दिया है। दूसरी ओर कांग्रेस सहित विपक्षी दलों का कहना है कि अदालती फैसलों के ख़िलाफ़ विरोध करना छात्रों का लोकतांत्रिक अधिकार है, हालांकि भाषा के प्रयोग में संयम बरतना चाहिए।
2016 के नारा-विवाद के बाद यमुना में बहुत पानी बह चुका है। उस समय सुर्खियों में आए तीन छात्र नेता आज तीन अलग-अलग स्थितियों में हैं। उमर ख़ालिद पाँच साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं और उनका मुकदमा अभी शुरू भी नहीं हुआ है। कन्हैया कुमार कांग्रेस नेता हैं। वहीं शेहला रशीद अब मोदी सरकार की प्रशंसा करती नज़र आती हैं। 10 साल बाद एक और नारा-विवाद में यह मामला कहां तक जाता है, यह देखना बाकी है।