डिमोना (इज़राइल): सेगेव कालफोन के लिए ग़ाज़ा में बिताए गए दो वर्ष किसी भयावह सपने से कम नहीं थे। इस दौरान वह अक्सर सपने में खुद को एक सुपरमार्केट में अपनी पसंदीदा चीज़ें चुनते हुए देखता था। लेकिन 13 अक्टूबर को रिहाई के बाद उसके सपने बदल गए हैं। अब आंखें बंद करते ही वह खुद को फिर उसी संकरी सुरंग में पाता है, जहां उसे हमास द्वारा अन्य बंधकों के साथ रखा गया था।
समाचार एजेंसी एपी के अनुसार 27 वर्षीय कालफोन ने बताया कि उसे केवल दो वर्ग मीटर के कमरे में रखा गया, जहां भयानक भूख, बीमारी और लगभग रोज़ होने वाली शारीरिक यातनाएं उसकी दिनचर्या बन चुकी थीं। उसे कब खाना मिलेगा, कब नहाने दिया जाएगा इस पर भी उसका कोई नियंत्रण नहीं था। क़ैद के सबसे बुरे दौर में वह इतना दुबला हो गया था कि अपनी रीढ़ की हड्डियों को गिन सकता था।
अब दक्षिणी इज़राइल के डिमोना में घर लौटने के बाद कालफोन एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करने की कोशिश कर रहा है। उसका ज़्यादातर समय डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों से मिलने में बीतता है। वह पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से जूझ रहा है और छोटी-सी आवाज़ भी उसे डरा देती है। नींद उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
कालफोन नोवा संगीत महोत्सव में बंधक बनाए जाने से पहले अपने परिवार की बेकरी में काम करता था और वित्त की पढ़ाई कर रहा था। 7 अक्टूबर 2023 को हमले के दौरान उसने और उसके दोस्त ने लोगों को बचाने की कोशिश की, लेकिन कई लोग मारे गए। इस पीड़ा की स्मृतियां आज भी उसका पीछा करती हैं।
क़ैद के अंधेरे समय में उसकी यहूदी आस्था ही उसका सहारा बनी। वह और अन्य बंधक त्योहारों पर थोड़े से पानी और सूखी रोटी के साथ प्रार्थना करते थे। एक रेडियो के माध्यम से कभी-कभी उन्हें बाहर की दुनिया की खबर मिल जाती थी, जिसने उन्हें उम्मीद दी।
अमेरिका की मध्यस्थता से हुए युद्धविराम के तहत कालफोन अन्य बंधकों के साथ रिहा हुआ। उसके अनुसार ग़ाज़ा का युद्ध भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन अब उसके भीतर एक नया युद्ध शुरू हुआ है-यादों, डर और मानसिक घावों से उबरने का। वह चाहता है कि दुनिया उसकी कहानी सुने ताकि लोग समझ सकें कि बंधक बनकर जीना क्या होता है और उसने क्या-क्या सहा है।