भारत में सुबह की शुरुआत अब सिर्फ अलार्म या सूरज की रोशनी से नहीं होती, बल्कि पेट्रोल और डीजल की ताजा कीमतों से होती है। सुबह ठीक 6 बजे देश की तेल विपणन कंपनियां (OMCs) नए रेट जारी करती हैं और उसी पल से आम आदमी के खर्च का गणित बदल जाता है। दफ्तर जाने वाला कर्मचारी हो, ऑटो चालक हो या सब्जी बेचने वाला छोटा व्यापारी-ईंधन के दाम तय करते हैं कि रोजमर्रा की जिंदगी कितनी महंगी होगी।
हर दिन 6 बजे क्यों बदलती हैं कीमतें
भारत में जून 2017 से पेट्रोल और डीजल की कीमतों को रोजाना रिवाइज करने की व्यवस्था लागू की गई। इसका मकसद था अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और डॉलर-रुपये की विनिमय दर में होने वाले बदलावों को सीधे घरेलू बाजार से जोड़ना।
हालांकि, व्यवहार में यह व्यवस्था कई बार सवालों के घेरे में रहती है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट के बावजूद देश में कीमतें लंबे समय तक स्थिर बनी रहती हैं।
Petrol Diesel Rate: दाम तय करने का पूरा फॉर्मूला
पेट्रोल-डीजल की कीमत तय करना सिर्फ कच्चे तेल का हिसाब नहीं है। इसके पीछे कई स्तरों की गणना होती हैः
-अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत।
-डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति।
-रिफाइनिंग और ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट।
-केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी।
-राज्य सरकारों द्वारा लगाया गया वैट और अन्य स्थानीय शुल्क
इन सभी को जोड़ने के बाद उपभोक्ता के लिए अंतिम कीमत तय होती है। यही कारण है कि एक ही दिन में अलग-अलग शहरों में पेट्रोल-डीजल के दाम अलग नजर आते हैं।
मूल कीमत से ज्यादा क्यों चुकानी पड़ती है रकम?
अगर सिर्फ कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत और रिफाइनिंग लागत को देखा जाए, तो पेट्रोल-डीजल की बेस कीमत काफी कम होती है। लेकिन टैक्स और शुल्क जुड़ते ही कीमत लगभग दोगुनी हो जाती है। इसी वजह से आम उपभोक्ता को लगता है कि चाहे कच्चा तेल सस्ता हो या महंगा, पेट्रोल-डीजल हमेशा ऊंचे दाम पर ही मिलता है।
एक देश, कई रेट: राज्यों की भूमिका
भारत में पेट्रोल-डीजल पर वैट राज्य सरकारें तय करती हैं। हर राज्य की वित्तीय जरूरतें और टैक्स नीति अलग होती है, इसलिए कीमतों में फर्क साफ नजर आता है।
मई 2022 में केंद्र सरकार और कई राज्यों ने टैक्स में कटौती की थी, जिसके बाद से कीमतों में लंबे समय तक ज्यादा बदलाव नहीं हुआ। इसके बावजूद आज भी राज्यों के अलग-अलग टैक्स ढांचे के कारण पेट्रोल-डीजल के दाम समान नहीं हैं।
भारत में पेट्रोल महंगा क्यों माना जाता है?
दुनिया के अलग-अलग देशों में पेट्रोल की कीमतों में बड़ा अंतर है। ईरान जैसे देशों में पेट्रोल बेहद सस्ता है, जबकि हांगकांग जैसे शहरों में इसकी कीमत बहुत ज्यादा है। भारत वैश्विक तुलना में बीच में जरूर आता है, लेकिन औसत आय के मुकाबले यहां पेट्रोल महंगा पड़ता है।
इसकी सबसे बड़ी वजह है टैक्स स्ट्रक्चर। केंद्र और राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल से बड़े पैमाने पर राजस्व जुटाती हैं। इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी और लॉजिस्टिक लागत भी कीमतों को ऊपर रखती है।
ईंधन के दाम और महंगाई का चक्र
पेट्रोल और डीजल की कीमतें सिर्फ वाहन चालकों को ही प्रभावित नहीं करतीं। ट्रांसपोर्ट महंगा होने से फल-सब्जी, दूध, रोजमर्रा के सामान और सेवाओं की कीमतें भी बढ़ती हैं। यानी ईंधन के दाम बढ़ते ही महंगाई का असर हर घर तक पहुंच जाता है।
हकीकतः कीमतें नहीं, नीति तय करती है असर
पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें बाजार की चाल से ज्यादा नीति और टैक्स स्ट्रक्चर पर निर्भर करती हैं। जब तक टैक्स व्यवस्था में बड़े सुधार नहीं होते, तब तक आम आदमी के लिए ईंधन की राहत सीमित ही रहेगी। सुबह 6 बजे जारी होने वाले ये रेट अब सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि हर परिवार के मासिक बजट की दिशा तय करने वाला अहम फैक्टर बन चुके हैं।