अमेरिका की सैन्य कार्रवाई में वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के गिरफ्तार होने के बाद विश्वभर में तीव्र अटकलें शुरू हो गई हैं। तेल बाजार से लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक हर क्षेत्र में यह सवाल उठ रहा है कि इस अस्थिरता का प्रभाव कितना गहरा होगा?
रविवार को प्रकाशित एक नोट में Global Trade Research Initiative (GTRI) ने बताया कि वेनेज़ुएला की वर्तमान संकट स्थिति भारत की अर्थव्यवस्था या ऊर्जा सुरक्षा पर कोई बड़ा असर नहीं डालेगी।
भारत-वेनेज़ुएला व्यापार
एक समय भारत और वेनेज़ुएला के बीच तेल और व्यापारिक संबंध काफी घनिष्ठ थे। 2000 से 2010 के बीच भारत वेनेज़ुएला के कच्चे तेल का एक बड़ा खरीदार था। उस समय भारत की सरकारी कंपनी ONGC Videsh वेनेज़ुएला के ओरिनोको बेल्ट में तेल उत्पादन परियोजना में साझेदारी भी करती थी।
लेकिन 2019 के बाद स्थिति तेजी से बदल गई। अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण भारत को वेनेज़ुएला से तेल आयात कम करना पड़ा। सेकेंडरी प्रतिबंध के जोखिम से बचने के लिए व्यापारिक गतिविधियां भी धीरे-धीरे सीमित कर दी गईं। इसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के व्यापारिक संबंध अब काफी कमजोर हो गए हैं।
आयात-निर्यात
GTRI के अनुसार 2024–25 वित्तीय वर्ष में वेनेज़ुएला से भारत का कुल आयात मात्र 36 करोड़ 45 लाख डॉलर था। इसमें कच्चे तेल का लेनदेन 25 करोड़ 53 लाख डॉलर का था। पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में यह आंकड़ा 81.3 प्रतिशत कम है। 2023–24 वित्तीय वर्ष में भारत ने 140 करोड़ डॉलर का तेल आयात किया था। मात्र एक वर्ष में यह काफी कम हो गया।
वेनेज़ुएला में भारत का निर्यात भी तुलनात्मक रूप से कम है। 2024–25 वित्तीय वर्ष में भारत का कुल निर्यात 9 करोड़ 53 लाख डॉलर था। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा दवाओं का था। जिसकी कीमत 4 करोड़ 14 लाख डॉलर थी।
इन आंकड़ों के आधार पर GTRI का कहना है कि व्यापार की मात्रा कम है, अमेरिका के प्रतिबंध हैं और दोनों देशों की भौगोलिक दूरी भी है—इन सब कारणों से वेनेज़ुएला की वर्तमान स्थिति भारत की अर्थव्यवस्था या ऊर्जा सुरक्षा के लिए कोई बड़ा जोखिम नहीं पैदा कर रही है। हालांकि इसके साथ ही भविष्य को लेकर संस्था ने चेतावनी भी दी है।
GTRI की चेतावनी
GTRI के अनुसार नए विश्व व्यवस्था में कच्चे माल और ऊर्जा पर नियंत्रण को लेकर संघर्ष और बढ़ सकता है। ऐसे परिदृश्य में भारत को रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए। किसी भी ऐसे समझौते से बचना चाहिए जो देश की संप्रभुता या दीर्घकालिक हितों को प्रभावित कर सकता है। साथ ही भू-राजनीतिक दबाव से बाहर महत्वपूर्ण कच्चे माल और ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
GTRI के विश्लेषण में यह सामने आया है कि अमेरिका की कार्रवाई का मुख्य लक्ष्य देश के विशाल तेल भंडार पर नियंत्रण पाना था। वेनेज़ुएला के पास विश्व का लगभग 18 प्रतिशत तेल भंडार है। तुलना करें तो सऊदी अरब के पास लगभग 16 प्रतिशत, रूस के पास 5 से 6 प्रतिशत और अमेरिका के पास मात्र 4 प्रतिशत है। अर्थात केवल वेनेज़ुएला में मौजूद तेल की मात्रा अमेरिका और रूस के संयुक्त भंडार सेभी अधिक है।
संस्था ने बताया कि अमेरिका ने पहले ही यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन जैसे साझेदार देशों के साथ समझौते किए हैं। जिसमें अमेरिकी पेट्रोलियम उत्पाद और LNG खरीदने का वादा शामिल है। लेकिन पर्याप्त कच्चे तेल और रिफाइनिंग क्षमता न होने के कारण अमेरिका के सामने बड़ी सीमाएं उत्पन्न हो गई हैं।
इस परिप्रेक्ष्य में दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक होने के कारण वेनेज़ुएला अमेरिका के लिए तेल का अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत है। GTRI का स्पष्ट मत है कि वेनेज़ुएला के तेल पर पूर्ण नियंत्रण पाना इस कार्रवाई का एक प्रमुख उद्देश्य था। कुल मिलाकर वेनेज़ुएला की अस्थिरता विश्व राजनीति में बड़ा प्रभाव डाल सकती है, लेकिन फिलहाल इस प्रभाव के भारत तक पहुंचने की संभावना बहुत कम है।