कोलकाता : पश्चिम बंगाल की जूट मिलों के अपने प्रॉविडेंट फंड ट्रस्टों को बंद कर कर्मचारियों की जमा राशि को सीधे ईपीएफओ (कर्मचारी भविष्य निधि संगठन) के अंतर्गत लाने उद्धेश्य है इसके लिए 3 जनवरी 2024 को राज्य सरकार, जूट मिल मालिकों के संगठन और कर्मचारी संगठनों के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ था। लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी यह समझौता पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है—यह आरोप मंगलवार को राज्य के जूट मिल कर्मचारी संगठनों ने लगाया।
ईपीएफओ के अतिरिक्त प्रॉविडेंट फंड आयुक्त की पहल पर आयोजित एक संवाद बैठक में जूट मिल श्रमिकों के 25 संगठन शामिल हुए। ईपीएफओ के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे। बैठक में यह भी आरोप लगाया गया कि ट्रस्टी बोर्डों में लंबे समय से चुनाव प्रक्रिया बंद है और पुराने बोर्ड अवैध रूप से काम चला रहे हैं।
इसके अलावा जूट उद्योग को बीमार उद्योग की श्रेणी में रखे जाने के कारण कर्मचारियों के वेतन से 12 प्रतिशत के बजाय 10 प्रतिशत अंशदान काटा जा रहा है, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। इतना ही नहीं कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों ने दावा किया कि कई जूट मिलों में कर्मचारियों के वेतन से अंशदान की राशि काट ली जाती है, लेकिन वह राशि तथा मिल मालिकों की अपनी अंशदान राशि जमा नहीं की जा रही है।
इस संदर्भ में सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के सदस्य और ट्रेड यूनियन को-ऑर्डिनेशन सेंटर के महासचिव शिवप्रसाद तिवारी ने कहा कि 2024 में त्रिपक्षीय समझौता होने के बाद अब तक केवल 12 जूट मिलों ने अपने निजी ट्रस्टों के बजाय सीधे ईपीएफओ के पास कर्मचारियों का पीएफ जमा करना शुरू किया है। अभी भी 30 जूट मिलें इसके दायरे में नहीं आई हैं।
उन्होंने इसके लिए जूट मिलों की अनिच्छा को जिम्मेदार ठहराया। उनके अनुसार विभिन्न बहाने दिखाकर पीएफ ट्रस्टों ने हिसाब-किताब बंद कर रखा है। नतीजतन यह स्पष्ट नहीं है कि किस कर्मचारी का कितना बकाया है। और जब तक हिसाब नहीं होगा, तब तक उन्हें सीधे ईपीएफओ के अंतर्गत लाना संभव नहीं है।
उन्होंने यह भी बताया कि इस स्थिति में ट्रस्टों में थर्ड पार्टी ऑडिट कराकर बकाया राशि और जुर्माने का हिसाब तैयार किया जाएगा तथा डिमांड नोटिस भेजी जाएगी, ऐसी चेतावनी दी गई है।