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क्या पीयूष के दावे के बावजूद समझौते को लेकर अनिश्चितता अब भी जारी?

‘मगर बसंत आ गया’ कहकर खुशी में गीत गाने का समय राष्ट्रपति के बयान की बारीकियों में न

By सुदीप्त तरफदार, Posted by : राखी मल्लिक

Feb 04, 2026 13:54 IST

नई दिल्ली : ‘अंधेरे में सांप, तो पूरे घर में सांप’ मानकर डर जाना सही होगा, या फिर बेवजह घबराए बिना चुपचाप बैठकर रोशनी आने का इंतजार करना ही समझदारी होगी—भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही है।

सोमवार रात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में साफ तौर पर बता दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुरोध को मानते हुए वे तत्काल नई दिल्ली पर लागू शुल्क दर को 50% से घटाकर 18% कर रहे हैं। यहां तक तो सब कुछ ठीक ही था। 50 प्रतिशत के बोझ के इस तरह एक झटके में कम हो जाने से भारतीय अर्थव्यवस्था निश्चित रूप से राहत की सांस ले सकती थी।

राहत की खबर के साथ उम्मीद जगी जरूर, लेकिन ‘बसंत आ गया’ कहकर गला तेज करके गाने का वक्त नहीं था। ट्रंप के बयान की फाइन प्रिंट ने मंगलवार भर यह याद दिलाया कि कहानी अभी अधूरी है।

जहां उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी भारत में अमेरिकी उत्पादों के आयात पर वर्तमान में लागू सभी टैरिफ और नॉन-टैरिफ बाधाओं को शून्य करने पर सहमत हो गए हैं। रूस से ऊर्जा खरीद बंद कर अमेरिका और वेनेजुएला से आयात करने पर भी सहमति जताई है। अगले पांच वर्षों में अमेरिका से विभिन्न क्षेत्रों में आयात को 500 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने पर भी राजी हुए हैं।

इन दावों में कितनी सच्चाई है यह स्पष्ट किए बिना राष्ट्रपति ट्रंप को बधाई देते हुए प्रधानमंत्री मोदी की ओर से किया गया नॉन-कमिटल ट्वीट अटकलों की आग को और भड़का गया।

स्वाभाविक रूप से सवाल उठने लगे कि जब 2026-27 के केंद्रीय बजट में भारत का आयात खर्च 53 लाख करोड़ रुपये आंका गया है, तो क्या उसका 85% हिस्सा वाशिंगटन की ओर ही जाएगा? विपक्ष की ओर से यह मांग उठने लगी कि इस तरह अमेरिकी उत्पादों के लिए भारत के बाजार के दरवाजे बिना शुल्क पूरी तरह खोल देना कितना तर्कसंगत है?

साथ ही यह बहस भी शुरू हो गई कि भारतीय छोटे किसानों को अमेरिकी बाजार के दबाव में पिसने से बचाने के लिए पिछले वर्ष से नई दिल्ली ने जो सख्त रुख अपनाया था, क्या उस पर अब विराम लग गया है? क्या 50% ट्रंप-टैरिफ के दबाव में भारी व्यापार घाटे का बोझ न झेल पाने के कारण मोदी सरकार को पीछे हटना पड़ा?

बाजार विशेषज्ञों के एक वर्ग का कहना है कि रूस से इस तरह रातों-रात तेल खरीद बंद करने जैसा कठिन फैसला देश में ईंधन की कीमतें बढ़ा सकता है और महंगाई की स्थिति को और गंभीर बना सकता है। मंगलवार को संसद में इन्हीं सवालों को लेकर विपक्ष ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी को कठघरे में खड़ा कर जमकर हंगामा किया। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को समझौते पर बयान देने का मौका दिए बिना ही वे राज्यसभा से वॉकआउट कर गए।

दिन भर की इस खींचतान के बाद शाम को पत्रकारों से मुखातिब होते हुए पीयूष ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश के हित को जरा भी नुकसान पहुंचाए बिना ही इस समझौते पर नई दिल्ली सहमत हुई है। मसौदे का काम लगभग अंतिम चरण में है, जिसकी विस्तृत जानकारी जल्द ही संयुक्त बयान के माध्यम से सामने लाई जाएगी।

साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि ‘गरीब–किसान–युवा–महिला’ समेत 140 करोड़ भारतीयों के समग्र विकास के हित में ही प्रधानमंत्री मोदी ने यह कदम उठाया है। डेयरी और कृषि समेत कई क्षेत्रों में संभावित नुकसान को लेकर विपक्ष की ओर से जो शोर मचाया जा रहा है, उसकी कोई बुनियाद नहीं है। इसलिए जब तक समझौते की विस्तृत शर्तें सामने नहीं आ जातीं, तब तक भारतीयों के पास आशा में जीने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

मंत्री की ओर से सरकारी बयान मिल जाने के बावजूद कई मामलों में अब भी धुंध साफ नहीं हुई है, ऐसा बाजार विशेषज्ञों का दावा है। उनका कहना है कि मोदी सरकार ने भले ही मॉस्को से कच्चे तेल की खरीद काफी कम कर दी हो, लेकिन अब भी रूस भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश है। इस फरवरी में रोज औसतन 10 लाख बैरल तेल रूस से भारत आ रहा है।

ट्रंप के दावे के मुताबिक इसे एक झटके में बंद किया जा रहा है या नहीं, इस पर केंद्रीय वाणिज्य मंत्री ने भी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी। वहीं क्रेमलिन की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि भारत सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान के अनुसार रूसी तेल खरीद बंद करने का कोई आधिकारिक संदेश मंगलवार तक नहीं भेजा है इसलिए वे इस पर प्रतिक्रिया देने से इनकार करते हैं।

रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भी दावा किया है कि इस तरह रूसी तेल की खरीद बंद करने से भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लग सकता है। दूसरी ओर अमेरिकी कृषि सचिव द्वारा मंगलवार को एक्स (पूर्व ट्विटर) पर किए गए एक पोस्ट ने भारतीय कृषि क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है। उन्होंने दावा किया कि यह समझौता अमेरिकी कृषि समुदाय की जीत है और इससे भारत के साथ कृषि क्षेत्र में 11,700 करोड़ रुपये के व्यापार घाटे को कम करने तथा खत्म करने का सुनहरा मौका मिला है।

बाजार विशेषज्ञों के एक हिस्से का मानना है कि राष्ट्रपति ट्रंप के बयान भले ही शब्दशः सही साबित हों, लेकिन इससे कृषि क्षेत्र में भी नई दिल्ली पर दबाव बढ़ेगा। इन्हीं में से एक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि यह सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा।

फल, अनाज और कई अन्य कृषि उत्पादों पर भारत में आयात शुल्क दुनिया में शीर्ष तीन में शामिल है। ऐसे में यदि शुल्क और नॉन-टैरिफ बाधाओं को एक झटके में शून्य कर दिया गया, तो अमेरिकी सस्ते मक्का, सोयाबीन तेल, डेयरी और फार्म उत्पादों के दबाव में भारतीय किसानों का एक बड़ा हिस्सा बाजार से बाहर हो सकता है। इसलिए शुल्क कम होने की खुशी में बह जाने के बजाय, अभी समय है कि विस्तार से जानकारी सामने आने का इंतजार किया जाए। तब तक सभी घोषणाओं को अंतिम सत्य मानने के बजाय, उन्हें राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश मानकर चलना ही बेहतर होगा।

आंकड़े बताते हैं कि 2025 में ट्रंप के व्हाइट हाउस पहुंचने से पहले, कई दशकों तक अमेरिका में भारतीय उत्पादों पर औसत आयात शुल्क 2.8% था, जबकि भारत में अमेरिकी उत्पादों पर यह लगभग तीन गुना, यानी 7.7% था। कृषि क्षेत्र में यह अंतर और भी ज्यादा स्पष्ट था। जहां भारतीय कृषि उत्पाद औसतन 7.7% शुल्क के साथ अमेरिका में प्रवेश करते थे, वहीं अमेरिकी कृषि निर्यात को भारत में 37.7% का भारी शुल्क देना पड़ता था।

संख्याओं के हिसाब से औद्योगिक उत्पादों में भी यह असंतुलन साफ दिखता है। वाशिंगटन में भारतीय औद्योगिक उत्पादों पर केवल 2.6% शुल्क लगता था, जबकि भारत में आने वाले अमेरिकी उत्पादों पर 5.9% शुल्क लगाया जाता था। आने वाले दिनों में ट्रंप अपनी कलम की एक लकीर से इन सभी अंतर को मिटा देंगे या नहीं, इस पर अटकलें अब चरम पर हैं।

भारत–अमेरिका प्रस्तावित समझौते की मूल भावना को लेकर धुंध साफ न होने के कारण, पोटस द्वारा घोषित यह समझौता कितना स्वाभाविक है, कितना दबाव में कराया गया है या कितना ट्रंप की प्रेशर पॉलिटिक्स का हिस्सा है, इस पर आगे भी सत्ता और विपक्ष के बीच बहस जारी रहेगी।

इस बीच उम्मीद और निराशा के झूले पर झूलते रहेंगे भारतीय कृषि और कई उद्योगों से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े करोड़ों लोग। राजनीतिक अखाड़े में अंततः आखिरी हंसी कौन हंसता है—ट्रंप या मोदी, इसी पर सबकी नजर टिकी रहेगी।

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