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रिन्यूएबल एनर्जी के बढ़ते कदमों से पावर इक्विपमेंट सेक्टर में तेजी

ट्रांसमिशन नेटवर्क पर बढ़ता निवेश, अगले 3-5 साल तक कंपनियों को मिलेंगे लगातार ऑर्डर।

By श्वेता सिंह

Apr 11, 2026 18:20 IST

नयी दिल्लीः भारत का पावर इक्विपमेंट सेक्टर अब एक नए और मजबूत विकास दौर में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। जे पी मोर्गन (JP Morgan) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश में नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) की तेजी से बढ़ती हिस्सेदारी और ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ते खर्च इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

रिपोर्ट बताती है कि हाई-वोल्टेज (HV) उपकरण बनाने वाली कंपनियां इस समय एक लंबे उछाल के दौर में हैं। इसकी वजह यह है कि बिजली ग्रिड को तेजी से बढ़ रही सौर और पवन ऊर्जा के अनुरूप मजबूत बनाया जा रहा है। सरकार की स्पष्ट नीतियां और रिन्यूएबल एनर्जी पर लगातार फोकस इस ग्रोथ को सहारा दे रहे हैं।

भारत ने अगले दस वर्षों में 470 गीगावॉट सौर और पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखा है। इस बड़े लक्ष्य को पूरा करने के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार जरूरी है, जिससे पावर इक्विपमेंट कंपनियों के लिए मांग लगातार बढ़ेगी।

रिपोर्ट के अनुसार, बड़े ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स को पूरा होने में आमतौर पर 3 से 5 साल लगते हैं। इसका मतलब है कि कंपनियों को लंबे समय तक ऑर्डर और कमाई की स्पष्टता बनी रहेगी, भले ही कुछ प्रोजेक्ट्स में देरी हो जाए।

हर साल ट्रांसमिशन सेक्टर में 8 से 9 अरब डॉलर के निवेश का अनुमान है। वहीं, हाई-वोल्टेज डायरेक्ट करंट (HVDC) तकनीक तेजी से अहम बनती जा रही है, जो लंबी दूरी तक बिजली पहुंचाने में मदद करती है। अगले 5-6 साल में इस क्षेत्र में 14 से 15 अरब डॉलर के अवसर बन सकते हैं।

सिर्फ घरेलू बाजार ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय कंपनियों के लिए मौके बढ़ रहे हैं। दुनियाभर में ग्रिड को अपग्रेड किया जा रहा है, नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार हो रहा है और AI आधारित डेटा सेंटर्स की वजह से बिजली की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। इससे भारतीय कंपनियां वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी जगह मजबूत कर सकती हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि HVDC जैसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा सीमित है और मांग-आपूर्ति का संतुलन कंपनियों के पक्ष में है। इससे उनके मुनाफे में सुधार होने की संभावना है।

हालांकि, सप्लाई चेन में रुकावट या कुछ प्रोजेक्ट्स में देरी जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं, लेकिन इनका असर ज्यादा लंबे समय तक नहीं रहेगा। कुल मिलाकर, भारत का पावर इक्विपमेंट सेक्टर ऊर्जा परिवर्तन के इस दौर में मजबूत स्थिति में है और आने वाले 3 से 5 वर्षों में इसके लगातार बढ़ने की उम्मीद है।

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