बारासातः मछली को लेकर पश्चिम बंगाल में सियासी माहौल गर्म हो गया है। इस बार बंगाल के विधानसभा चुनाव में ‘मछली राजनीति’ एक नए चुनावी मुद्दे के रूप में उभरकर सामने आई है, जहां केंद्र और राज्य के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। हल्दिया की रैली से पीएम मोदी ने हमला साधते हुए दावा किया कि टीएमसी सरकार तो बंगाल को ढंग से मछली भी नहीं खिला पा रही है। इसका जवाब देते हुए टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने पलटवार किया है कि भाजपा शासित राज्यों में लोगों को मांसाहारी भोजन खाने की अनुमति तक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि मछली उत्पादन में बंगाल नंबर वन है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयान के बाद यह मुद्दा और अधिक चर्चा में आ गया, जिसके बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कड़ा पलटवार किया है। उन्होंने राज्य की मछली उत्पादन क्षमता को लेकर उठाए गए सवालों को गलत बताया।
ममता बनर्जी ने मोदी के तंज पर पेश किये आंकड़े
बारासात के कचहरी मैदान में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मछली उत्पादन से जुड़े विस्तृत आंकड़े सामने रखे। उन्होंने कहा कि तृणमूल सरकार के कार्यकाल में राज्य का मछली उत्पादन 1 लाख 72 हजार मीट्रिक टन से बढ़कर 23 लाख 74 हजार मीट्रिक टन तक पहुंच गया है।
मुख्यमंत्री ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल आयात की तुलना में 76 हजार मीट्रिक टन अधिक मछली निर्यात करता है। इसके अलावा, करीब 1 लाख 45 हजार मीट्रिक टन मछली विदेशों में भी भेजी जाती है, जिससे राज्य की अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी मजबूत उपस्थिति बनी हुई है।
‘बंगाल सबसे आगे’ का दावा और चुनावी सियासत
ममता बनर्जी ने स्पष्ट रूप से कहा कि मछली बीज उत्पादन के मामले में पश्चिम बंगाल देश में सबसे आगे है। उन्होंने कहा कि राज्य में 224 हेक्टेयर बड़े जलाशयों में मछली पालन किया जा रहा है और छोटी मछलियों के लिए अलग संरचनाएं विकसित की गई हैं। उन्होंने मछुआरों के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं का भी उल्लेख किया, जिनमें मछुआरा क्रेडिट कार्ड और ‘समुद्रसाथी’ परियोजना शामिल है, जो मछुआरों को आर्थिक और तकनीकी सहायता प्रदान करती हैं।
मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि राज्य की उपलब्धियों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बंगाल की वास्तविक स्थिति को समझने की जरूरत है और राज्य इस क्षेत्र में “सबसे आगे” है। मछली उत्पादन को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब केवल कृषि या अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है। यह विवाद पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बन चुका है, जहां दोनों पक्ष अपने-अपने दावों और आंकड़ों के साथ आमने-सामने हैं।