रूपक बसु
12 फरवरी को बांग्लादेश में होने वाले संसदीय चुनाव में क्रिकेट एक बड़ा मुद्दा बनकर उभर रहा है। उपमहाद्वीप में क्रिकेटरों के राजनीति में आने के कई उदाहरण हैं जैसे अर्जुन रणतुंगा, मशरफी मोर्तजा, शाकिब अल हसन, यूसुफ पठान, कीर्ति आजाद, मोहम्मद अजहरुद्दीन, लक्ष्मीरतन शुक्ला और मनोज तिवारी। लेकिन इस बार खिलाड़ी नहीं बल्कि क्रिकेट ही चुनावी बहस के केंद्र में है। खास तौर पर बांग्लादेश के हालिया टी20 विश्व कप बहिष्कार के फैसले का असर वोटों पर पड़ सकता है।
टी20 विश्व कप का बहिष्कार सही था या गलत, इस सवाल पर देश दो हिस्सों में बंटा हुआ है। एक वर्ग का मानना है कि कड़ी भारत विरोधी नीति के तहत विश्व कप न खेलने का फैसला बिल्कुल सही था। दूसरा पक्ष अलग राय रखता है। वे भारत विरोध को लेकर असहमति न भी जताएं, फिर भी उनका मानना है कि लिटन दास और मुस्तफिजुर रहमान जैसे खिलाड़ियों को विश्व कप से वंचित नहीं किया जाना चाहिए था। इस मतभेद का असर चुनाव परिणाम पर पड़ सकता है।
चुनाव में मुख्य मुकाबला जमात ए इस्लामी और बीएनपी के बीच है। कई लोगों का मानना है कि यदि जमात सत्ता में आती है तो बांग्लादेश में क्रिकेट का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। आरोप है कि जमात क्रिकेट के विकास के बजाय इस खेल को खत्म करने की सोच रखती है। बांग्लादेश में क्रिकेट केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि राष्ट्रीय भावना से भी जुड़ा है। कुछ क्रिकेट प्रेमियों का मानना है कि यदि क्रिकेट को लोगों के दिल से दूर कर दिया गया तो जमात के लिए अपनी विचारधारा का प्रसार करना आसान हो जाएगा। दूसरी ओर, विश्व कप न खेलने से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में बांग्लादेश के हाशिए पर चले जाने की आशंका भी लोगों के मन में है। कई लोगों का कहना है कि विश्व मंच पर बांग्लादेश की पहचान काफी हद तक क्रिकेट से बनी है। शाकिब और तमीम जैसे खिलाड़ियों के प्रदर्शन ने देश को वैश्विक पहचान दिलाई है इसलिए आईसीसी के साथ विवाद सुलझाकर जल्द से जल्द अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी जरूरी है, जो फिलहाल बीएनपी कर सकती है।
सूत्रों के अनुसार, क्रिकेटर खुद भी विश्व कप में न खेलने के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। टीम को भारत में विश्व कप खेलने भेजने की इच्छा होने के बावजूद अंतरिम सरकार के दबाव में बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के शीर्ष अधिकारी खुलकर कुछ नहीं कह पा रहे हैं। कई लोग चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन की उम्मीद में हैं। पाकिस्तान से भारत के खिलाफ मैच खेलने के अनुरोध का मुद्दा भी चुनावी माहौल में चर्चा में है। कुछ लोगों का कहना है कि पाकिस्तान का सहमत होना बांग्लादेश की नैतिक जीत है। वहीं दूसरी राय यह है कि पाकिस्तान ने चुनाव में जमात की स्थिति मजबूत करने के लिए बांग्लादेश को मित्र कहा। भारत के खिलाफ मैच न खेलने की धमकी और फिर उसे वापस लेना उसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था। कुल मिलाकर गुरुवार को मतदान के समय बांग्लादेश के मतदाताओं के मन में क्रिकेट से जुड़ी हालिया घटनाएं जरूर रहेंगी।