कोलकाताः पश्चिम बंगाल के हालिया चुनावी नतीजों ने केवल राजनीतिक समीकरण ही नहीं बदले, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी क्षमता को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। बीते कुछ वर्षों में अदालतों में राज्य सरकार को जिस तरह लगातार झटके लगे, उसे अब चुनावी परिणामों से जोड़कर देखा जा रहा है। कई वरिष्ठ कानून विशेषज्ञों का मानना है कि कानूनी मोर्चे पर कमजोर पड़ती स्थिति ने सरकार की साख को प्रभावित किया और इसका असर जनता के भरोसे पर भी पड़ा।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के नेतृत्व वाली सरकार को कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) से लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) तक कई महत्वपूर्ण मामलों में राहत नहीं मिली। शिक्षक भर्ती से जुड़े एसएससी मामले में करीब 26 हजार नौकरियों का रद्द होना सबसे बड़ा झटका माना गया। इस फैसले ने न केवल प्रभावित अभ्यर्थियों में असंतोष पैदा किया, बल्कि सरकार की भर्ती प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े किए।
इसके बाद ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) मामले ने भी राज्य सरकार की मुश्किलें बढ़ाईं। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान राज्य के पक्ष को कई बार कमजोर पड़ते देखा गया। अदालत ने राज्य के वकीलों की दलीलों के आधार पर न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति कर ‘एडजुडिकेशन’ प्रक्रिया शुरू कराई। इस प्रक्रिया के तहत लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। इसका सबसे अधिक असर उत्तर और दक्षिण 24 परगना, मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में पड़ा, जहां सत्तारूढ़ दल का मजबूत जनाधार माना जाता था।
मालदा के मोथाबाड़ी में न्यायिक अधिकारियों के घेराव की घटना भी सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार के लिए असहज स्थिति का कारण बनी। इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ता (डीए) बकाया, ओबीसी आरक्षण, आईएएस-आईपीएस अधिकारियों के तबादले और चुनाव के दौरान केंद्रीय बलों की तैनाती जैसे मुद्दों पर भी राज्य सरकार को अदालतों में निराशा हाथ लगी। इन मामलों के फैसलों का असर अलग-अलग वर्गों में देखा गया, जिससे असंतोष का दायरा और व्यापक हुआ।
कानून के जानकारों का एक वर्ग मानता है कि इन लगातार हारों के पीछे केवल मामलों की जटिलता ही नहीं, बल्कि राज्य की कानूनी तैयारी और रणनीति की कमजोरी भी एक अहम कारण रही। आरोप यह भी है कि बीते कुछ वर्षों में अनुभवी और स्वतंत्र कानूनी विशेषज्ञों को किनारे कर राजनीतिक रूप से करीबी माने जाने वाले लोगों को प्राथमिकता दी गई। इससे कानूनी मामलों में निरंतरता और गहराई दोनों प्रभावित हुईं।
कोलकाता हाईकोर्ट के पूर्व पब्लिक प्रॉसिक्यूटर शाश्वतगोपाल मुखोपाध्याय ने संकेत दिया कि 2023 में उन्हें अचानक पद से हटाया जाना व्यापक संस्थागत बदलाव का हिस्सा था। उनके अनुसार, इससे कानूनी तैयारी और संस्थागत मजबूती पर असर पड़ा। वहीं, पूर्व सरकारी वकील अनिर्वाण राय का कहना है कि पेशेवर स्वतंत्रता से समझौता करने के कारण महत्वपूर्ण मामलों में अपेक्षित मजबूती नहीं दिखी, जिससे अदालतों में बार-बार असफलता मिली।
विशेषज्ञों का मानना है कि अदालतों में लगातार मिली हार ने केवल कानूनी स्थिति को ही कमजोर नहीं किया, बल्कि इससे प्रशासनिक विश्वसनीयता पर भी असर पड़ा। यही कारण है कि चुनावी नतीजों में जनता के भरोसे में आई कमी भी साफ तौर पर दिखायी दी।