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“क्या आजीवन कारावास के बावजूद राम रहीम आज़ाद, जबकि अभियुक्त उमर जेल में ही रहेगा?”

बलात्कारी-धर्मगुरु को जेल भेजने वाले वकील अश्विनी बोल-‘यह न्याय नहीं, प्रहसन है’

By शिलादित्य साहा, posted by डॉ. अभिज्ञात

Jan 06, 2026 13:35 IST

नयी दिल्लीः कोई दोषी सिद्ध हुए बिना जेल में है तो कोई दो-दो आजीवन कारावास की सज़ा पाने के बाद भी बाहर! पहले मामले में दिल्ली दंगों के एक प्रमुख षड्यंत्रकारी के रूप में अभियुक्त जेएनयू के युवा छात्र नेता उमरल खालिद है। सितंबर 2020 में यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम) के तहत गिरफ्तारी के बाद से उमर की कम से कम सात बार ज़मानत याचिका खारिज हो चुकी है। हैरानी की बात यह है कि पिछले पाँच वर्षों में इस मामले की सुनवाई तक शुरू नहीं हुई। आख़िरी बार सोमवार, 5 जनवरी को उनकी ज़मानत याचिका खारिज की गई।

दूसरी ओर, स्वयंभू ‘गॉडमैन’ गुरमीत राम रहीम सिंह-दो हत्याओं और एक बलात्कार, कुल तीन मामलों में दोषी ठहराया गया और तीनों में आजीवन कारावास की सज़ा मिली। स्वाभाविक तौर पर लगे कि 2017 से जेल में बंद ऐसा अपराधी शायद बाहर की दुनिया नहीं देख पाया होगा। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। सज़ा के बाद से राम रहीम कम से कम 15 बार पैरोल पर जेल से बाहर आ चुका है। वह भी एक-दो दिन के लिए नहीं। आठ वर्षों में वह कम से कम 400 दिन जेल से बाहर ‘आज़ाद जीवन’ बिता चुका है।

यह विरोधाभास क्यों? जब कानून के जानकार यह सवाल उठा रहे हैं, तब राम रहीम को जेल भेजने वालों में शामिल वरिष्ठ वकील अश्विनी बख्शी साफ कहते हैं-पूरे मामले को न्याय के नाम पर प्रहसन बना दिया गया है। इसी कारण जघन्य अपराधों में सज़ायाफ़्ता लोग जेल से बाहर हवा खाते हैं, जबकि कुछ लोगों की ज़मानत बिना मुक़दमे के ही सालों तक खारिज होती रहती है। जबकि हमारी न्याय व्यवस्था की मूल भावना है—“बेल इज़ नैचरल, जेल इज़ एक्सेप्शन।”

2017 में पंचकुला की विशेष सीबीआई अदालत ने गुरमीत राम रहीम को अपनी दो शिष्याओं से बलात्कार के मामले में दोषी ठहराया था। आजीवन कारावास के बाद हरियाणा के रोहतक स्थित सुनारिया जेल उसका ठिकाना बना। 2019 में सीबीआई अदालत ने 2002 में ‘पूरा सच’ अख़बार के संपादक छत्रपति की हत्या के मामले में फिर से आजीवन कारावास सुनाया। 2021 में डेरा सच्चा सौदा के प्रबंधक रंजीत सिंह की हत्या (घटना 2002, स्थान कुरुक्षेत्र) में भी उसे आजीवन कारावास मिला। हालांकि 2024 में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने रंजीत सिंह हत्या मामले में उसे बरी कर दिया, फिर भी वह दो मामलों में आजीवन कारावास की सज़ा भुगत रहा है। “तो क्या वह अब भी जेल के भीतर है?”-सवाल बना हुआ है।

छत्रपति हत्या मामले में शिकायतकर्ता के वकील अश्विनी का सीधा आरोप है कि हरियाणा में चाहे ओमप्रकाश चौटाला की सरकार रही हो, कांग्रेस की या भाजपा की—सत्ता में बैठे लोगों ने हमेशा राम रहीम को ‘अलग नज़र’ से देखा। 2014 के बाद तो हालात सारी सीमाएँ पार कर गए। नहीं तो हत्या-बलात्कार में आजीवन कारावास पाए अभियुक्त को 15 बार, वह भी 40-50 दिनों के लिए, पैरोल क्यों मिलती? जिला मजिस्ट्रेट उसकी पैरोल क्यों मंज़ूर करते हैं? राज्य सरकार का विधि विभाग उस पर मुहर क्यों लगाता है? यह न्याय है या प्रहसन?

अश्विनी का कहना है कि सरकार और प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर इस स्वयंभू ‘गॉडमैन’ का प्रभाव इतना है कि उसकी सज़ा का बड़ा हिस्सा पैरोल में बीत रहा है। वहीं दिल्ली दंगों में बड़े षड्यंत्र के आरोपी उमर खालिद के मामले में ठीक उलटा हो रहा है-यूएपीए के तहत अभियुक्त उमर अब भी जेल में हैं।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियों द्वारा पेश साक्ष्यों से यह प्रबल संदेह बनता है कि दिल्ली दंगों से उमर का सीधा संबंध था। अदालत में उमर के वकील ऐसी कोई ठोस दलील पेश नहीं कर सके, जिसके आधार पर उन्हें अभी ज़मानत दी जा सके। दूसरी ओर, 2020 से हिरासत में होने के बावजूद उमर के मामले की सुनवाई अब तक शुरू नहीं हुई। इस पर वरिष्ठ वकील अश्विनी की टिप्पणी है-“बार-बार ज़मानत खारिज करना सही नहीं। यह न्याय व्यवस्था की भावना के खिलाफ है। यदि दंगों में उसकी भूमिका है, तो मुक़दमे में दोष सिद्ध किया जाए। रोहतक की जेल में तो दोषी सिद्ध लोग महीनों पैरोल पर बाहर रहकर आज़ाद जीवन बिता रहे हैं।”

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