मान्यताओं के अनुसार बनारस को भगवान शिव ने अपने त्रिशूल पर बसाया था। इस वजह से गंगा नदी का महत्व काशी में कुछ ज्यादा ही होता है। देश के हर कोने से लोग यहां घूमने आते हैं। कोई काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने की इच्छा से आता है तो कोई बनारस के घाटों की सुन्दरता में ही खो जाता है।
बनारस जाने वाले अधिकांश लोगों के मन में कम से कम एक बार गंगा जल लेकर आने का ख्याल जरूर आता है। लेकिन सावधान रहें। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बनारस से गंगा जल लाने का मतलब है घोर पाप!
बनारस में है महादेव का वास
हिंदू मान्यताओं के अनुसार बनारस में जीवन से अधिक मृत्यु का महत्व है। कहा जाता है कि बनारस में अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उसे मोक्ष का लाभ मिलता है। कहा जाता है कि मसान होली के दिन, जब काशी की मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं के बीच होली खेली जाती है, तब अपने भूत-पिशाचों व गणों के साथ महादेव स्वयं यहां आते हैं। इस वजह से बड़ी संख्या में लोग बनारस से गंगा जल लाकर पूजा-पाठ के कार्यों में उसका इस्तेमाल करना काफी शुभ मानते हैं। लेकिन क्या ऐसा करना शुभ है?
काशी से गंगा जल लाना क्या शुभ है?
बनारस के दो घाट - मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर हर दिन असंख्य लोगों का अंतिम संस्कार किया जाता है। कहा तो यहां तक जाता है कि मणिकर्णिका घाट पर चिताएं कभी बुझती ही नहीं है। अंतिम संस्कार के बाद चिता की राख को वहीं गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है।
मान्यताओं के अनुसार ऐसा करने से एक व्यक्ति जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है और उसे मोक्ष मिलता है। इसलिए जब कोई व्यक्ति बनारस से गंगा जल लेकर आता है, तो वह मरने वाले व्यक्ति के मोक्ष में बाधक बन जाता है क्योंकि उस जल में मृतक की चिता की राख मौजूद होती है। ऐसे जल का पूजन कार्यों में इस्तेमाल वर्जित माना जाता है।
कहां से लाएं गंगा जल?
देश के उन सभी शहरों जहां से होकर गंगा नदी प्रवाहित होती है, वहां से गंगा जल लाया जा सकता है। हरिद्वार, गंगोत्री, प्रयागराज के अलावा पटना, कोलकाता आदि किसी भी शहर के घाट से पूजन कार्यों के लिए गंगा जल भरकर लाया जा सकता है। कोशिश करें गंगा जल को किसी मंदिर के घाट से भरे ताकि किसी प्रकार की अशुद्धि की कोई संभावना न रह जाए।