मैसूरुः कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया राज्य के इतिहास में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री बनने वाले नेता बनेंगे। वह पूर्व मुख्यमंत्री डी. देवराज़ उर्स का रिकॉर्ड तोड़ेंगे, जिन्होंने 7 साल और 239 दिन तक यह पद संभाला था। सिद्धारमैया बुधवार को 7 साल और 240 दिन का कार्यकाल पूरा करेंगे। सिद्धारमैया ने स्वयं कहा कि यह उपलब्धि जनता के आशीर्वाद का नतीजा है। उनकी लगातार लोकप्रियता और 13 चुनावों में 8 जीत यह दर्शाती है कि वे मैसूरु क्षेत्र में मजबूत आधार रखते हैं। यह रिकॉर्ड केवल लंबी सेवा का प्रमाण नहीं है, बल्कि कांग्रेस की कर्नाटक में स्थिरता और रणनीतिक नेतृत्व क्षमता का भी संकेत है।
सामाजिक पृष्ठभूमि का महत्व
सिद्धारमैया ने देवराज उर्स से अपनी तुलना में सामाजिक अंतर को स्पष्ट किया। जहां उर्स शासक वर्ग से थे, वहीं सिद्धारमैया पिछड़े समुदाय (कुरुबा) से आते हैं। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि राज्य में सामाजिक पिछड़े वर्ग के नेताओं को भी लंबे समय तक नेतृत्व करने का अवसर मिलता है। इससे राज्य की राजनीति में सामाजिक समावेशिता की दिशा मजबूत होती है।
बजट और प्रशासन में रिकॉर्ड
सिद्धारमैया अब तक 16 बजट पेश कर चुके हैं। यह उनके प्रशासनिक अनुभव और वित्तीय प्रबंधन की क्षमता को दर्शाता है। आगामी बजट की तैयारी मकर संक्रांति के बाद शुरू होगी। यह संकेत देता है कि उनका नेतृत्व केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और प्रशासनिक रूप से भी महत्वपूर्ण रहा है।
वर्तमान राजनीतिक चुनौतियां
मुख्यमंत्री ने कैबिनेट फेरबदल की योजना की पुष्टि की है और इसे कांग्रेस नेतृत्व के साथ समन्वय से करने की बात कही। बल्लारी हिंसा और फायरिंग की घटनाओं पर उन्होंने जांच पूरी होने का इंतजार करने की बात कही। इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य में कानून-व्यवस्था और राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती उनके सामने है।
केंद्र-राज्य संबंध और वित्तीय दबाव
सिद्धारमैया ने केंद्र सरकार की नीतियों पर आलोचना करते हुए कहा कि जीएसटी मुआवजा और रोजगार योजनाओं में बदलाव से कर्नाटक को सालाना 12–15 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। मनरेगा योजना के अधिकारों में कमी और नई योजना में 40 प्रतिशत खर्च राज्य पर डालने से राज्य की वित्तीय स्थिति पर दबाव पड़ा है। यह दर्शाता है कि केंद्र-राज्य संबंध कर्नाटक की राजनीति और विकास पर सीधे प्रभाव डाल सकते हैं।
सिद्धारमैया का रिकॉर्ड केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह कर्नाटक में राजनीतिक स्थिरता, सामाजिक समावेशिता और प्रशासनिक अनुभव का प्रतीक है। उनकी लंबी सेवा यह भी दिखाती है कि राजनीतिक नेतृत्व केवल चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और प्रशासनिक दक्षता से स्थायी होता है। हालांकि, केंद्र-राज्य संबंध और स्थानीय कानून-व्यवस्था जैसी चुनौतियां उनके कार्यकाल के दौरान महत्वपूर्ण मुद्दे बनी रहेंगी।