नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच युद्धविराम की उम्मीदें लगातार कमजोर पड़ती दिख रही हैं। अमेरिका की ओर से अस्थायी तौर पर तनाव कम करने की कोशिशों के बावजूद इजरायल द्वारा लेबनान पर किए गए हमलों ने हालात को और बिगाड़ दिया है।
इस घटनाक्रम से ईरान नाराज हो गया और पहले घोषित किए अपने ही बात से पीछे हटते हुए उसने हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर फिर से कड़े नियंत्रण लगा दिए।
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए युद्धविराम का संकेत दिया था। इसके जवाब में ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि हॉर्मुज मार्ग से गुजरने वाले तेल टैंकरों को दो शर्तों का पालन करना होगा—पहली, यात्रा से पहले ईरानी सेना को सूचित करना जरूरी होगा, और दूसरी, सूचना देने के बाद भी तकनीकी कारणों से किसी जहाज को अनुमति नहीं दी जा सकती।
इजरायल के हमले के बाद ईरान ने इन शर्तों को और सख्त करते हुए मार्ग पर प्रभावी रोक लगा दी। इसका असर यह हुआ कि जहां पहले रोजाना औसतन 10 जहाज इस रास्ते से गुजर रहे थे, वहीं पिछले डेढ़ दिन में यह संख्या घटकर महज 5 रह गई है।
स्थिति की अनिश्चितता को देखते हुए बीमा कंपनियों ने भी इस मार्ग को लेकर चिंता जताई है और जहाजों को अनुमति देने में हिचकिचाहट दिखाई है। संयुक्त अरब अमीरात की प्रमुख तेल कंपनी ने भी इसी तरह की आशंका व्यक्त की है।
इस तनाव का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ा है। ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर करीब 125 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है, जो यह संकेत देती है कि निकट भविष्य में स्थिति सामान्य होने की उम्मीद कम है। इसका असर भारत समेत एशिया के उन देशों पर पड़ सकता है, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं—इनकी चालू खाता घाटा और बढ़ सकता है।
इसी बीच ऊर्जा संसाधनों से समृद्ध देश जैसे ईरान और रूस इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। खबर है कि रूस वैश्विक कीमत से कम दर पर एलएनजी बेचने का प्रस्ताव दे रहा है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से भारत के लिए इस विकल्प को अपनाना आसान नहीं होगा।
ऐसे में भारत अपेक्षाकृत सुरक्षित आपूर्ति के लिए कतर की ओर रुख कर रहा है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी हाल ही में दो दिवसीय दौरे पर कतर पहुंचे हैं, जहां वे भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाने पर बातचीत कर सकते हैं।