🔔 ताज़ा ख़बरें सबसे पहले!

Samachar EiSamay की ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, खेल, मनोरंजन और बिज़नेस अपडेट अब सीधे आपके पास।

महाराष्ट्र में ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी अनिवार्य, फैसले पर गरमाई सियासत

परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने नियम लागू करने का किया ऐलान। 1 मई के बाद नियम तोड़ने वालों पर होगी कार्रवाई।

By श्वेता सिंह

Apr 11, 2026 01:06 IST

मुंबईः महाराष्ट्र सरकार ने ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा को अनिवार्य करने का बड़ा फैसला लिया है। इस फैसले के तहत ड्राइवरों को मराठी पढ़ने, लिखने और बोलने की बुनियादी योग्यता साबित करनी होगी। राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने स्पष्ट किया कि यह नियम पूरे महाराष्ट्र में लागू किया जाएगा। सरकार का कहना है कि यात्रियों के साथ बेहतर संवाद स्थापित करने और परिवहन लाइसेंस से जुड़ी अनियमितताओं को रोकने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है। महाराष्ट्र मोटर वाहन नियम 1989 के नियम 24 में पहले से इस प्रावधान का उल्लेख मौजूद है, जिसे 2019 में और सख्ती के साथ लागू किया गया था।

मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में लाखों लोग इस क्षेत्र से जुड़े हैं। करीब 2.8 लाख ऑटो परमिट और 20 हजार टैक्सी परमिट के जरिए लगभग 5 लाख ड्राइवरों को रोजगार मिलता है।

मीरा-भायंदर में पायलट प्रोजेक्ट, 1 मई से सख्ती

फिलहाल इस योजना को मीरा-भायंदर क्षेत्र में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया गया है। यहां 12 हजार से अधिक ड्राइवरों के दस्तावेजों-जैसे परमिट, डोमिसाइल सर्टिफिकेट (15 वर्ष का निवास) और मराठी भाषा ज्ञान की जांच की जा रही है।

ड्राइवरों को आरटीओ कार्यालय में मराठी में पैराग्राफ लिखना होगा और मौखिक परीक्षा भी देनी होगी। सरकार ने साफ किया है कि 1 मई (महाराष्ट्र दिवस) के बाद नियमों के पालन में सख्ती बढ़ेगी और उल्लंघन करने वालों के लाइसेंस या परमिट निलंबित किए जा सकते हैं।

फैसले पर विरोध, प्रवासी ड्राइवरों की चिंता

इस फैसले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के नेता अबू आसिम आजमी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि किसी भी भाषा को जबरन थोपना उचित नहीं है।

उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को मराठी सीखने के लिए मुफ्त किताबें और प्रशिक्षण सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मुंबई जैसे महानगर में दूसरे राज्यों से आए लोगों को रोजगार का अधिकार है और भाषा के आधार पर उन्हें परेशान नहीं किया जाना चाहिए। कई प्रवासी ड्राइवरों ने भी इस फैसले को लेकर चिंता जताई है, क्योंकि उन्हें अपनी आजीविका प्रभावित होने का डर है।

भाषा बनाम रोजगार: संतुलन की जरूरत

सरकार इस फैसले को स्थानीय भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम कदम मान रही है। वहीं, विरोधी पक्ष इसे रोजगार और प्रवासी कामगारों के अधिकारों से जोड़कर देख रहा है।

आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि पायलट प्रोजेक्ट के बाद सरकार इस नीति में क्या बदलाव करती है और इसे किस तरह पूरे राज्य में लागू किया जाता है।

Articles you may like: