पश्चिम बंगाल का गंगासागर भारत के तीर्थों में एक महातीर्थ है। गंगाजी इसी स्थान पर आकर सागर में मिलती हैं। इसी स्थान पर राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ था। यहां मकर संक्रान्ति पर बहुत बड़ा मेला लगता है जहां लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए आते हैं। गंगासागर मेले का आयोजन मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल सरकार करती है, जो राज्य के दक्षिण 24 परगना जिले में सागर द्वीप पर मकर संक्रांति के अवसर पर होता है। केंद्र सरकार का सहयोग न मिलने के बावजूद यह मेला राज्य के लिए एक बड़ा आयोजन है। हर साल मकर संक्रांति के पावन अवसर पर आयोजित होने वाले गंगासागर मेले को "राष्ट्रीय मेले" का दर्जा दिए जाने की मांग वर्षों से की जा रही है लेकिन केंद्र सरकार इसे नजरंदाज करती आ रही है। हालांकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र पर आरोप लगाती आ रही हैं कि केंद्र सरकार सिर्फ श्रेय लेने की कोशिश करती है लेकिन न गंगासागर को "राष्ट्रीय मेले" का दर्जा दिला रही है और न ही मुड़ी गंगा पर पुल बनाने की जिम्मेदारी ली। आखिरकार उन्होंने खुद 1700 करोड़ रुपये की लागत से गंगा पर पुल बनाने का जिम्मा लेकर इसकी घोषणा भी कर दी।
गंगासागर मेले के प्रबंधन, सुरक्षा, परिवहन और अन्य व्यवस्थाओं का मुख्य जिम्मा पश्चिम बंगाल सरकार का होता है, खासकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस आयोजन को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देती हैं।
स्थानीय प्रशासन: दक्षिण 24 परगना जिले का प्रशासन (DM कार्यालय) और स्थानीय निकाय मेले की व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
धार्मिक और सामाजिक संगठन:
कपिल मुनि मंदिर और आसपास के क्षेत्र में कई अन्य धार्मिक संस्थाएँ और स्थानीय लोग भी मेले के आयोजन में योगदान करते हैं, जैसे कि साफ-सफाई और अन्य व्यवस्थाएँ।
प्रायोजक और समर्थन:
राज्य सरकार का वित्तपोषण: पश्चिम बंगाल सरकार अपने कोष से इस मेले के लिए भारी-भरकम फंड जारी करती है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार केंद्र सरकार से इस मेले को 'राष्ट्रीय मेला' घोषित करने की मांग करती रही हैं, ताकि केंद्र से भी वित्तीय सहायता और समर्थन मिल सके, लेकिन केंद्र ने अब तक इस पर ध्यान नहीं दिया है।
कॉरपोरेट और अन्य सहयोग (संभव): हालांकि मुख्य रूप से राज्य सरकार द्वारा आयोजित, कुछ सालों में स्थानीय व्यवसायों या गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) द्वारा भी स्टॉल लगाने या कुछ गतिविधियों में सहयोग देखा गया है।
संक्षेप में गंगासागरः
"सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार" इसलिए कहा जाता है क्योंकि गंगासागर का धार्मिक महत्व बहुत ज़्यादा है और यहाँ पहुँचना ऐतिहासिक रूप से बहुत कठिन और जोखिम भरा रहा है, जहाँ एक डुबकी से कई तीर्थ यात्राओं के बराबर पुण्य मिलता है, जिससे इसका महत्व अन्य तीर्थों से अलग हो जाता है, हालाँकि आधुनिक सुविधाओं के कारण अब यहाँ पहुँचना आसान हो गया है।
इस कहावत के मुख्य कारण:
धार्मिक महत्व: यह वह स्थान है जहाँ गंगा नदी बंगाल की खाड़ी से मिलती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा सगर के 60,000 पुत्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ था, और मकर संक्रांति के दिन यहाँ स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ और हज़ार गायों के दान जितना पुण्य मिलता है।
दुर्गम यात्रा: पहले के समय में गंगासागर द्वीप घने जंगलों, खतरनाक जानवरों (जैसे बंगाल टाइगर) और डाकुओं से घिरा था, जिससे यहाँ पहुँचना बेहद मुश्किल और जानलेवा था, इसलिए इसे 'एक बार' जाने लायक माना गया।
मोक्ष प्राप्ति: गंगासागर में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है, जो इसे अन्य तीर्थों से श्रेष्ठ बनाता है, जहाँ बार-बार जाने की ज़रूरत पड़ सकती है।
आधुनिक समय में:
आजकल, परिवहन और सुविधाओं में सुधार के कारण गंगासागर पहुँचना आसान हो गया है, लेकिन इस कहावत के पीछे की धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक महत्व आज भी बरकरार है।
राज्य सरकार की भूमिका: गंगासागर मेला पूरी तरह से पश्चिम बंगाल सरकार (पर्यटन विभाग और स्थानीय प्रशासन) द्वारा आयोजित किया जाता है।
बुनियादी ढांचा: विद्युतीकरण, जल निकासी, सड़कों (रिंग रोड), रैन बसेरों, और हेलीपैड जैसे काम राज्य सरकार करवाती है।
सुरक्षा और व्यवस्था: हजारों पुलिसकर्मियों की तैनाती, अतिरिक्त बसें, नौकाएं, और केंद्रीय नियंत्रण कक्ष से निगरानी राज्य की जिम्मेदारी है।
स्वास्थ्य और बीमा: तीर्थयात्रियों के लिए बीमा कवर और चिकित्सा सुविधाएं राज्य सरकार प्रदान करती है।