इस्लामाबाद : करीब 47 साल बाद ईरान और अमेरिका के बीच सीधी बातचीत हुई लेकिन पाकिस्तान की मेजबानी में इस्लामाबाद में हुई लंबी शांति वार्ता के बावजूद कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद यह पहला मौका है जब दोनों देश आमने-सामने बातचीत करते दिखे।
बैठक से पहले और दौरान बयानबाजी भी तेज रही। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान युद्ध में कमजोर पड़ चुका है और अब उसकी उम्मीद हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी है। उन्होंने साफ किया कि समझौता हो या न हो अमेरिका इस रास्ते को खुलवाकर रहेगा। दूसरी ओर, ईरान अपनी मांगों पर अड़ा रहा और इजरायल से लेबनान पर हमले रोकने की शर्त रखी।
शनिवार रात तक कोई सहमति नहीं बन सकी। हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और ईरानी प्रतिनिधिमंडल के बीच ढाई घंटे की बैठक के बाद ईरान और अमेरिका के बीच एक दौर की सीधी बातचीत हुई। इससे उम्मीद जगी लेकिन परिणाम नहीं निकला।
बैठक तय समय से करीब पांच घंटे देर से शुरू हुई। बताया गया कि ईरान ने अमेरिका के सामने कड़े शर्त रखे जिनमें लेबनान में इजरायली हमले रोकना और कतर में फंसी 6 अरब डॉलर की ईरानी संपत्ति को छोड़ना शामिल था। हालांकि अमेरिका ने इन दावों को खारिज किया और कहा कि इन मुद्दों को शर्तों के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
इस बीच हॉर्मुज क्षेत्र में तनाव बना रहा। बैठक के दौरान दो अमेरिकी युद्धपोत इस क्षेत्र से गुजरे जिन्हें समुद्री बारूदी सुरंगों की तलाश के लिए भेजा गया है ऐसा बताया गया।
पाकिस्तान की भूमिका को लेकर भी स्पष्टता नहीं है। शुरुआत में कहा गया कि दोनों पक्ष अलग-अलग कमरों में बैठे और पाकिस्तान ने मध्यस्थता की। बाद में कुछ सूत्रों ने दावा किया कि तीनों पक्ष आमने-सामने भी बैठे।
बैठक के दौरान ‘पोशाक कूटनीति’ भी चर्चा में रही। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल के स्वागत में सैन्य वर्दी पहनी जबकि अमेरिकी दल के स्वागत में औपचारिक सूट में नजर आए। इसे अलग-अलग देशों के सामने अलग संदेश देने की कोशिश माना जा रहा है।
इस बीच लेबनान में इजरायल के हमले जारी रहे। पिछले 24 घंटे में 200 से ज्यादा ठिकानों पर हमले हुए और मृतकों की संख्या 2000 से अधिक हो गई है।
भारत की विदेश नीति को लेकर भी सवाल उठे। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका पर केंद्र सरकार की आलोचना की। वहीं शशि थरूर ने कहा कि इस मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि शांति ज्यादा जरूरी है।
कुल मिलाकर इस बैठक से उम्मीद तो जगी लेकिन अविश्वास और कड़े रुख के कारण समाधान फिलहाल दूर नजर आ रहा है।