पश्चिम एशिया के साथ पिछले डेढ़ महीने से भी लंबे समय से चल रहे युद्ध को रोकने के लिए इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत शुरू हुई थी। इस वार्ता पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई थी लेकिन बिना किसी नतीजे पर पहुंचे ही यह वार्ता फेल हो गयी। ईरान का आरोप है कि अमेरिका की 'अनुचित मांग' की वजह से ही यह शांति वार्ता विफल हुई है।
वहीं अमेरिकी की ओर से वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस का दावा था कि वे अंतिम और सबसे बेहतरीन प्रस्ताव के साथ ही वार्ता की टेबल पर बैठे थे। हालांकि उन्हें संदेह जरूर था कि इस प्रस्ताव को ईरान स्वीकार करेगा या नहीं। उन्होंने बताया कि यह बातचीत सफल नहीं हुई, जो ईरान के लिए ही अधिक नुकसानदायक है।
वेंस ने बताया कि बातचीत के दौरान उन्होंने कई बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी बात की थी। इस शांति वार्ता के दौरान अमेरिका ने जो मुख्य शर्तें रखी थी उनमें शामिल था : ईरान फिर से परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे न बढ़े। लेकिन तेहरान इस शर्त को स्वीकार करने के लिए राजी नहीं हुआ।
बता दें, यह बैठकर पिछले 1 दशक के दौरान अमेरिका और ईरान के बीच पहली सीधी उच्चस्तरीय बैठक थी। 1979 को हुए इस्लामिक क्रांति के बाद से ही दोनों देशों के रिश्तों में खटास आनी शुरू हो गयी थी। ऐसी स्थिति में यह बैठक बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही थी।
बैठक के लिए इस्लामाबाद पहुंचे अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई जेडी वेंस कर रहे थे। इसके साथ ही विशेष दूत स्टिव विटकॉफ और जैरेड कुशनर भी शामिल थे। वहीं दूसरी तरफ ईरान के प्रतिनिधिमंडल में ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची मौजूद थे।
गौरतलब है कि पश्चिम एशियाई युद्ध की वजह से अब तक हजारों मासूमों की जान जा चुकी है। ईंधन की आपूर्ति को लेकर भी बड़ी समस्या पैदा हो गयी है। विश्वभर में मुद्रास्फीति की समस्या पैदा हो गयी है जिसका अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ रहा है। ऐसी परिस्थिति में ईरान-अमेरिका के बीच शांति वार्ता का असफल होना चिंताएं बढ़ा रहा है। जानकारों का मानना है कि अगर ये समस्याएं बनी रही तो युद्ध और भी भीषण आकार ले सकता है। इस वजह से अंतर्राष्ट्रीय बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि तेल और गैस की कीमतों पर नए सिरे से फिर से दबाव बढ़ने की आशंका पैदा हो गयी है।